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रविवार, 8 मई 2022

साहित्यिक चोरी का कलापक्ष

कल शाम लेखक-मित्र का फ़ोन आया।बड़े आहत थे।कहने लगे,उनके साथ बड़ी नाइंसाफ़ी हुई है।उनकी एक ‘हिट-रचना’ सोशल मीडिया से चोरी हो गई।दो दिन पहले ही उन्होंने उसे वहाँ लगाया था।ख़ूब वाहवाही भी बटोरी थी,पर कुछ लोगों ने उसे अपने नाम से कई जगह बाँट दिया।इस बात की खबर भी उन्हें दूसरों से मिली।उनके लिए यह बहुत बड़ा साहित्यिक-आघात है।उनके दुःख की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता क्योंकि मेरी कभी कोई रचना चोरी नहीं हुई।सच तो यह कि लिखने के बाद मुझसे ही नहीं पढ़ी गई तो दूसरे क्या पढ़ते !


ख़ैर,अभी उनकी बात चल रही है तो उन्हीं पर फ़ोकस करते हैं।उनको इतना आहत जानकर मुझे थोड़ा अचरज हुआ।सोचने लगा,ऐसे समय में जब समाज से सद्भाव, देश से लगाव और बड़े गोदामों से निठल्ले नींबू चोरी हो रहे हैं, उन्हें अपनी रचना की पड़ी है, पर नहीं कहा।और भी आहत हो सकते थे।इसलिए मैंने फ़ौरी सांत्वना दी, ‘भई, चोरी होने के ख़तरे हैं तो फ़ायदे भी।फ़िलहाल आप केवल फ़ायदे गिनें।चोरी होकर ही आपकी रचना वायरल हो पाई,वर्ना इसका शायद ही कोई ज़िक्र करता।अब सब जगह इसका प्रसार हो रहा है।मतलब वायरल होने के लिए चोरी होना ज़रूरी है।इसलिए तुम इसका केवल उजला पक्ष देखो।अब तुम प्रेमचंद और परसाई की क़तार में शामिल हो गए हो।जगह-जगह छपकर और कई संस्करणों में बिककर जो उपलब्धि नहीं हासिल कर पाए,वह इस इकलौती रचना ने चोरी होकर दिला दी।यह बड़ी बात है।’ मेरी दो-टूक सुनकर वे और टूट गए।कहने लगे,‘यार, कभी तो सीरियस हुआ करो।मेरी तो नींद उड़ी हुई है।जिन लोगों ने रचना को अपने नाम से लगाया है,लोग उन्हें ही असली रचनाकार मान रहे हैं।मेरी दिक़्क़त अलग क़िस्म की है।एक तो मैं लिखता नहीं।लिखता हूँ तो कोई छापने को तैयार नहीं होता।कहते हैं,सब आपकी तरह बेरोज़गारी नहीं निभा सकते।ले-दे के सोशल मीडिया बचा था,यहाँ भी चोरों ने क़ब्ज़ा कर रखा है….’

  

उनको बीच में ही टोकते हुए मैंने कहा,‘देखिए ,जिन्हें तुम चोर कह रहे हो,तुम्हारी रचनाओं के सजग पाठक और असली प्रशंसक वही हैं।पूरे मनोयोग से पढ़ने के बाद ही वे उन्हें चुराने के क़ाबिल समझते हैं।अपनी ओर से कोई हेरफेर न करके पूरी रचना को मौलिक रूप में आगे बढ़ा देते हैं,बस।इसे तुम ‘चुराना’ कहकर उनकी प्रतिभा का अपमान कर रहे हो।कम से कम वे आज के आलोचकों की तरह नहीं हैं जो एक तरफ़ तो अपने मित्रों की रचनाओं को बिना पढ़े सिर पर चढ़ा लेते हैं, वहीं अमित्र लेखक की रचना को ललाट पर चश्मा चढ़ाकर उसका ‘क्लास’ देखते हैं और एकदम से ख़ारिज कर देते हैं।इससे तो ये ‘चोट्टे’ कहीं अधिक ईमानदार हैं।’


‘फिर भी इस चौर्यकर्म को मैं भुला नहीं सकता।मेरा नाम मिट्टी में मिल जाता तो भी मैं संतोष कर लेता,पर इस कृत्य से तो सोशल-मीडिया में मिल गया हूँ।आने वाले सभी सम्मान यही चोट्टे हथिया सकते हैं।यह अन्याय मेरे साथ नहीं पूरी साहित्यिक-बिरादरी के साथ हुआ है।इससे मोर्चा लेने की ज़रूरत है,न कि आँख मूँद लेने की।जब हम अपने धर्म को बचाने के लिए ‘शोभायात्रा’ और जुलूस तथा देशभक्ति साबित करने के लिए ‘तिरंगा-यात्रा’ निकाल रहे हैं, फिर मेरी रचना के लिए भी ‘मौलिक यात्रा’ क्यों नहीं ! इस पर साहित्य-जगत मौन क्यों है ? यह सभी रचनाकर्मियों का धर्म है।’ इतना कहकर उन्होंने ठंडी साँस भरी।


उनके मुँह से धर्म का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए।वे साहित्य में धर्म घुसेड़ने पर आमादा थे।पहले ही राजनीति में घुसकर धर्म ने सबका कल्याण कर दिया है,अभी भी उनको उससे आस है।धर्म के प्रति उनके प्रेम को देखकर मेरे मन में ‘निम्न’ विचार आने लगे।‘लोगों के दिलों से भक्ति,इबादत कब चोरी हो गई पता ही नहीं चला।ईश्वर पूरी तरह नारे में बदल गया है।लोग इतने आस्थावान हो गए हैं कि दूसरों के घरों में घुसकर प्रार्थनाएँ बाँच रहे हैं।’मैंने उनसे यह सब नहीं कहा बल्कि उनके संघर्ष वाले जज़्बे की सराहना की।उन्होंने भी साहित्यिक-चोरों को देख लेने की बात कहकर फ़ोन काट दिया।


उनके इस दुःख से मुझे आत्मीय सुख मिला।मैं मन ही मन ख़ुश था,पर संवाद के दौरान प्रकट नहीं होने दिया।लिखते-पढ़ते इतनी कुशलता तो आ ही गई है।इस ‘साहित्यिक-चोरकटई’ को झाँकने के लिए मैंने सोशल मीडिया में प्रवेश किया।सभी चोर अपनी बात पर अड़े थे।एक युवा चोर ने ज्ञान दिया कि लिखने के बाद रचना लेखक की नहीं रह जाती।साहित्य और राजनीति में विज्ञान की तरह का कोई पेटेंट नहीं होता।हर कोई अपनी कलात्मकता दिखा सकता है।एक वरिष्ठ चोर ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके कविता के तीन संग्रह इसी प्रतिभा की उपज हैं।अगर इस तरह इस कला पर प्रतिबंध लगाया गया तो साहित्य भी नीरस होकर रह जाएगा।हम जैसे लोग ही साहित्य का सही प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।आज का पाठक भी विवादित साहित्य को पहले लपकता है।इसलिए इस कला को संरक्षण की ज़रूरत है।उनके इन तर्कों का सभी संभावित चोरों ने समर्थन किया।मैं बिना कुछ कहे ‘ट्विटर’ में कूद पड़ा।यहाँ लेखक-मित्र की रचना को एक अनुभवी चोर ने अपने नाम से पोस्ट कर रखा था।मैंने उस पर कमेंट किया,‘साहित्यिक चोरी अच्छी बात नहीं।’ उसने इसे भी तुरंत रिट्वीट कर दिया।


संतोष त्रिवेदी 

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

मेरी कभी कोई रचना चोरी नहीं हुई।सच तो यह कि लिखने के बाद मुझसे ही नहीं पढ़ी गई तो दूसरे क्या पढ़ते !

हा हा। बहुत खूब।