रविवार, 4 जून 2023

जब मैं अफ़सर बनते-बनते बचा !

बीते दिनों मैं अफ़सर बनते-बनते रह गया।इस बात का मुझसे ज़्यादा मेरे दोस्तों ने बुरा माना।दिन में दो बार मेरा हाल-पता लेने वाले अब मेरा फ़ोन तक नहीं उठा रहे।मैंने यह सोचकर स्वयं को सांत्वना दी कि वे बेचारे अभी भी ‘ग़मी’ में होंगे।जब उबरेंगे,मुझे उबारने आएँगे।ख़ुद से ज़्यादा तो उनका नुक़सान किया है मैंने।मेरे कहे बिना न जाने कितनी आशाएँ उन्होंने लगा ली थीं।कई दोस्त इस भरम में सिविल लाइन चौराहे में मेरी चाय की उधारी बढ़ा चुके थे।अगर मुझे रत्ती-भर भी इस बात की आशंका होती,मैं पूजा-पाठ के घंटे और बढ़ा देता।बहरहाल,जो नहीं होना था,होकर रहा।जब अंतिम परिणाम आया,मैं हतप्रभ रह गया।सुना था,लोग एक वोट से हारते हैं या एक नंबर से फेल होते हैं,पर मेरे साथ बिलकुल अजूबा हुआ ! रिकॉर्ड बनाने से मैं बस एक रोल नंबर दूर था।ऐन मेरे आगे बैठी मोहतरमा पूरे प्रदेश में चौथे स्थान पर आई थीं।सफलता मेरे कितने निकट बैठी थी,पर अफ़सोस,मैं जान न पाया।यह क़िस्सा जब मेरे एक परम् हितैषी मित्र ने सुना तो कहने लगे , ‘काश, वह भद्र स्त्री तुम्हारे पीछे होती ! हर सफल आदमी के पीछे स्त्री होती है, यह तो सुना ही होगा तुमने।’ ऐसा कहकर वे खिस्स से हँस पड़े।मित्र सहानुभूति जताने आए थे और समीक्षा करके चले गए।


लेकिन अब सिर धुनने से क्या होता ! मैं राष्ट्रीय समाचार पत्रों में ‘ख़बर’ बनते-बनते रह गया था।यह कसक मुझे अफ़सरी न मिलने से ज़्यादा साल रही थी।दिखने में यह एक चूक का मामला लगता है,पर इसने कई घटनाओं को घटित होने से पहले मार दिया था।सबसे पहली तो यही कि मेरी ‘संघर्ष-गाथा’ सबके सामने प्रकट होने से वंचित रह गई।इससे कई संभावनाओं की भ्रूण-हत्या हो गई।आने वाली पीढ़ी के लिए मैं कुछ प्रेरक कहानियाँ गढ़ पाता।अपनी सफलता को माता-पिता के सिर मढ़ता।कोई ऐसी कहानी जिसमें संघर्ष न हो,ट्विस्ट न हो,प्रभावी नहीं होती।इसलिए इसमें पिता की ग़रीबी काम आती।यह अख़बार की ‘लीड-स्टोरी’ बनती और वायरल होती।जो लोग सोचते हैं कि ग़रीबी अभिशाप है,उन्हें अपनी धारणा बदलनी पड़ती।मैं सफल हो जाता तो पलक झपकते उसे वरदान में बदल देता।जिस कठिन संघर्ष से मैं चुनकर आता,भविष्य में जनता की उतनी ही चुन-चुनकर सेवा करता।ख़ैर,छोड़िए।यह चूक मुझ पर,समाज, साहित्य और राजनीति पर कितनी भारी पड़ी है, इसका केवल अंदाज़ा लगाइए।सही आकलन तो सफल होने पर ही होता !


एक छोटी-सी लापरवाही से मैं मशहूर होते-होते बचा था।आगे और मशहूरी बदा थी।नियति को लेकिन यह कहाँ मंज़ूर था ! मेरी कहानी से पहले उसकी अपनी कहानी जो रिलीज़ होनी थी।मैंने अफ़सर बनने के बाद पूरी योजना बना रखी थी।ड्यूटी जॉइन करने से पहले इंटरनेट मीडिया में अपनी हाज़िरी लगाता।सभी परिचित-अपरिचित मुझे फॉलो करते,मैं किसी को नहीं करता।अफ़सर बनते ही मामूली आदमी बनकर थाने जाता और एफ़आईआर लिखवाने का ‘लाइव’ निवेदन करता।फिर उस ‘मना’ को इंटरनेट में अपलोड कर देता।जिस मशहूरी के लिए इंद्र आदि देवता तरसते हैं,पलक झपकते ही मेरी मुट्ठी में होती।मेरी धाक जमती और ‘वैल्यू’ भी बढ़ती।इस तरह आए दिन पब्लिक से नेकी करता और जो मेरा काम था, उसे करके इंटरनेट पर बड़ी विनम्रता से उसका क्रेडिट लेता।


पहले आदमी मशहूरी के लिए मरता है,फिर उसमें भी जायका ढूँढ़ने लगता है।पर यह सब मैं बिलकुल नहीं करता।पहले से योजना बनाकर रखता।ख्याति में चार-चाँद लगाने के लिए मैं साहित्य में कूद पड़ता।अफ़सर से साहित्यकार बनने का सफ़र बेहद आसान है।मैं जो लिखता,साहित्य हो जाता।जो बोलता,वह सूत्र-वाक्य होता।बड़े प्रकाशक और संपादक फेरे लगाते।अकादमियों से वैध संबंध होते।साहित्य को ऊँचाइयाँ प्रदान करने के लिए पहाड़ों पर निकल जाता।वहीं से सेल्फ़ी भेज-भेजकर ‘जनसेवा’ किया करता।दिन-रात साहित्य में डूबा रहता।एक हाथ से कविता को साधता,दूसरे से कहानी को।सम्मान और पुरस्कार अपने-आप सध जाते।‘बेस्टसेलर साहित्यकार’ होता।पुस्तक-समीक्षाओं के लिए आलोचकों की चिरौरियाँ नहीं करनी पड़तीं।लोग मुझसे ही लिखवा लेते।मेरा मस्तिष्क शोध का विषय होता।विश्वविद्यालय में मेरे नाम की पीठ होती और मैं स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनता।


अंततः मेरे क्रिया-कलापों से जब साहित्य का दम निकलने लगता,मेरा रिटायरमेंट आ जाता।साहित्य को थोड़ा चैन मिलता पर मुझे नहीं।अफ़सरी से तो रिटायर होता,पर जनसेवा से नहीं।इसलिए फिर राजनीति में कमाल करता।नौकरी में जिन वरिष्ठों ने कष्ट दिए होते,उनकी उचित प्रकार से कुशल-क्षेम लेता।जिन अफ़सरों ने मेरे सम्मान में टाँग अड़ाने की कोशिश की होती,उनकी तैनाती सूखे विभाग में करता।इस तरह मैं नित नए प्रतिमान गढ़ता,यदि मेरे आगे बैठी उस महिला का रोल नंबर मेरा होता।उस एक अंक के अंतर ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।इस तरह समाज,साहित्य और राजनीति सब मेरी सेवाओं से वंचित हो गए !


संतोष त्रिवेदी 

न तुम जीते,न हम हारे😉

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