रविवार, 1 मार्च 2026

असल बुद्धि बनाम नक़ल बुद्धि

इन दिनोंबुद्धिचर्चा में है ।दिलचस्प है कि यह बुद्धिबनावटीहै।कहते हैं बाज़ार में इसकी भारी माँग है।असल-बुद्धि की बड़ी कमी थी तभी वह इतनीडिमांडमें आई बनावटी-बुद्धिके इस अचानक उबाल से सभी हतप्रभ हैं; ख़ासकर असल बुद्धि।जिस बुद्धि को मनुष्य ने बड़ी मेहनत और जतन से अर्जित किया था, उसे यह नई-नवेली और नकली बुद्धि महज़ एक उँगली से ख़ारिज कर रही है।पहले प्रतिभा का प्रदर्शन सामान्य तरीक़े से और कभी-कभार होता था,अब तुरंत विस्फोट हो रहा है।जो गणना घंटों और दिनों में होती थी,वह पलक झपकते हो रही है।इससे मेधा और प्रतिभा अपने को असहाय महसूस कर रही हैं।समझदार लोग इसेनवाचारकह रहे हैं।

इस संघर्ष मेंबाल-बुद्धिऔरबैल-बुद्धिको बड़ा मज़ा रहा है।असल बुद्धिने लंबे समय तक एकछत्र राज किया है।हमेशा इसने दूसरों का मज़ाक़ बनाया।अपने आगे किसी को घास तक नहीं डाली।सच तो यह है किअक़्ल बड़ी या भैंसका सही अर्थ कभी समझ में ही नहीं आया।बुद्धिमानों ने जाने कैसे-कैसे मुहावरे गढ़ रखे थे ! कभी तो अक़्ल को घुटने तक ले आए और कभी बैल,गधा और भैंस को अक़्ल का पर्याय बना दिया।इसके उलट शेर,भेड़िया और लकड़बग्घे ज़्यादा बुद्धिमान माने गए।यहाँ भी मनुष्य ने सामाजिक भेदभाव बरता।उसने बुद्धि का बँटवारा कुलीनों में ही किया।हमारे पूर्वजों से किसी ने यह तक नहीं पूछा कि भाई, भैंस को अक्ल के मामले में क्यों घसीट रहे हो ? बेचारी भैंस को पता भी नहीं कि अब तक उसका कितनी बार सार्वजनिक अभिनंदन किया गया है ! अक़्ल वाला कोई इंसान होता तो मानहानि का दावा कर देता या न्यायालय ही इतने महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर स्वतः संज्ञान ले लेता।पर भैंस तो किसी अभिजात्य-वर्ग में आती नहीं।उसे अब घास खाने के भी लाले पड़ रहे हैं क्योंकि आजकल के युवा वही छील रहे हैं।बनावटी-बुद्धिने उनके लिए संभावनाओं कीरीलजो खोल दी है।नक़ली प्रोफाइल,नक़ली वीडियो और नक़ली कंटेंट का बड़ा बाज़ार बाहें फैलाए उसे दबोचने के लिए खड़ा है।


वैसे मनुष्य है बड़ा अजीब प्राणी।वह लीक पर चलने में विश्वास नहीं करता।उस पर हमेशा कुछ अलग करने की सनक सवार रहती है।बनावटी-बुद्धिमनुष्य का नया खिलौना है।पढ़े-लिखे लोग आईसे नीचे बात ही नहीं कर रहे हैं।कुछ ने इसे अपने दिल को बहलाने का यंत्र बना लिया है।कृत्रिम-बुद्धिविज्ञान,कला,चिकित्सा में तो कमाल कर ही रही है, इसके ज़रिएफ़ास्ट-फ़ूडसे भी फ़ास्ट साहित्य रचा जा रहा है। आईके मुँह में केवल पाँच शब्द झोंकने पर पाँच सौ शब्दों का साहित्य पल भर में प्रकट हो जाता है।ये अपने प्रेमचंद और परसाई भी पैदा कर लेगी।एक और बड़ा अंतर पैदा हुआ है इन दोमेधाओंमें।पहले वाली मेधा जहाँ बादाम और गाजर खाने से जागृत होती थी, अब वाली केवल डेटा की ख़ुराक लेती है।साहित्य अब ऐसे समृद्ध होगा।समारोहों में वक्तव्य आईका होगा किंतु लिफाफे की हिफ़ाज़त महोदय के पास होगी।


इस सबके इतर कुछ ग़ैर-ज़रूरी सवाल भी हैं।तमाम लोगों को आशंका है किबनावटी-बुद्धिरोजगार खा जाएगी, आदमी किसी काम का नहीं रहेगा।ये सब केवल अफवाहें हैं।अव्वल तो आदमी अब किसी काम का बचा ही कहाँ ? दूसरे उसकी असल बुद्धि भी नक़ली वाली के शरणागत हो गई है।सच तो यह है कि आदमी ने अपने निकम्मेपन का तोड़ पा लिया है।काम करने का बहाना केवल आदमी बनाता रहा है,मशीन नहीं।उसे जोटास्कदिया जाता है,वह उसी वक़्त पूरा कर लेती है , कि बीड़ी फूँकती है ! इसलिए कोई भी मशीनी यंत्र कितना भी चतुर हो जाए,आदमी से अधिक शातिर कभी नहीं हो सकता।नकली बुद्धिका एक महत्त्वपूर्ण हासिल यह भी है कि आदमी ने अपने लिए एक ईमानदार नौकर रख लिया है।समय बताएगा कि भविष्य में यहनौकरआदमी को किस तरह और कितनी मदद करता है या रफूचक्कर होता है


इस नई बुद्धि से नेता अलग रोमांचित हैं।उन्हें लगता है, चुनाव में वादे वे करेंगे और उन्हें पूरा आईकर देगी।अगर यह प्रयोग सफल रहा तो आईजल्द ही प्रदूषण और ट्रैफिक का समाधान भी निकाल लेगी।फिर वेकूड़े के पहाड़को भी उसी से उठवा लेंगे ! काम संतोषजनक रहा तो आगे चलकरईवीएमकी भी सेवा ली जा सकेगी।असल-बुद्धि का इस्तेमाल केवल पोस्टरबाजी और लफ़्फ़ाज़ी के लिए किया जाएगा।इससे इसके और घिसने का ख़तरा भी कम होगा।


बहरहाल, दुनिया ने अब तकअसल बुद्धिका कहर देखा है, ट्रंप का टैरिफ झेला है।अब उसेनकली-बुद्धिका ज़हर भी दिखेगा और डीपफेक का अमृत भी।


असल बुद्धि बनाम नक़ल बुद्धि

इन दिनों ‘ बुद्धि ’ चर्चा में है ।दिलचस्प है कि यह बुद्धि ‘ बनावटी ’ है।कहते हैं बाज़ार में इसकी भारी माँग है।असल-बुद्धि की...