मंगलवार, 9 सितंबर 2014

इस प्यार को क्या नाम दें!

नैतिकता जी बड़ी तेजी से राजभवन की ओर भागी जा रही थीं।हम बड़ी मुश्किल से उनसे बचे नहीं तो टकरा ही जाते।इस भगदड़ का कारण पूछने पर नैतिकता जी ने बताया कि अचानक उनकी माँग बढ़ गई है और वे अपने प्रति इस अप्रत्याशित अनुराग के लिए तैयार नहीं थीं।वे आगे कहने लगीं,’अभी अभी राजभवन से सूचना आई है कि जनहित जी की बिगड़ती हालत के लिए दोषी सिर्फ मैं हूँ और अब आगे ऐसी स्थिति कतई स्वीकार नहीं की जा सकती है।वे महीनों से अनाथ पड़े हैं और हमारी तरफ़ टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं।’

हम उनके इस कथन से भौंचक रह गए।जब समझ में कुछ नहीं आया तो उनकी ओर सवालिया नज़रों से देखने लगे।वे मामले को बिलकुल साफ़ करने के मूड में दिख रही थीं।उन्होंने हमें अपने पीछे-पीछे आने का संकेत दिया।हम मंत्रमुग्ध हो उनका अनुसरण करने लगे।वे अब तक अपने को सामान्य कर चुकी थीं इसलिए उनकी आवाज़ में अब कोई थरथराहट भी नहीं थी।हमारी जिज्ञासा को शांत करते हुए वे बताने लगीं,’ मैंने इस बीच बहुत अकेलापन भोगा है,जनहित जी को भी हमने बहुत मानसिक संताप दिया है।मुझसे उनका तड़पना अब देखा नहीं जाता।राजभवन भी चाहता है कि मैं अब कोई ना-नुकुर न करूँ,इसी में उसका भी हित निहित है।इसलिए लोक-लाज के दिखावटी बंधन तोड़कर,मैं जनहित जी को अपनाने जा रही हूँ।आप इस सम्बन्ध से सहमत हैं ?’

‘हाँ,हाँ क्यों नहीं ? अगर आपने न्योता दिया है तो हम अस्वीकार नहीं कर सकते।अगर आपने दावत क़ुबूल की है तो हम भी उसमें शरीक़ होंगे।हम आपसे अलग थोड़े ही हैं।राज्य के आमन्त्रण को न स्वीकारना घोर अशिष्टता होगी और कम से कम हमसे तो अब यह नहीं हो पायेगा।आपको इस पवित्र बंधन की बधाई पर हमारे एक सवाल का जवाब दोगी क्या ?’

‘बिलकुल जी।हम तो आत्मा की पुकार के साथ हैं और उसको अपने साथ कर चुके हैं सो अब किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।पूछिए जो पूछना है।’ नैतिकता जी ने बिना रुके,ठिठके जवाब दिया।

’इतने दिनों तक आपने जनहित जी को कष्ट क्यों दिया,वे तो आपसे गले मिलने को कब से आतुर बैठे थे ?’ हमने भी तपाक से पूछ ही डाला।

‘दरअसल,हमारे पास डेट्स की समस्या थी।उस समय हम किसी और के साथ डेटिंग पर थे।अब हम भी खाली हैं और जनहित जी भी;सो कोई समस्या नहीं रही।हनीमून-पीरियड के लिए भी हमें अच्छा–खासा पैकेज मिल रहा है तो क्यों मना करें ?’ इतना कहकर नैतिकता जी ने खुला हुआ घूँघट पूरी तरह उघाड़ दिया और राजभवन में प्रविष्ट हो गई।

रविवार, 7 सितंबर 2014

पान की दुकान पर मास्टर जी !

सरकार ने कामकाज के सौ दिन पूरे कर लिए हैं पर लगता है कि कर्मचारियों के दिन भी पूरे हो गए है।पब्लिक के अच्छे दिन आएं हों या नहीं,पर सरकारी कर्मचारियों के बुरे दिन ज़रूर आ गए हैं।केंद्र सरकार के दफ्तरों में दो-चार छापे क्या पड़े,सुबह नौ बजे से लेकर शाम छः बजे तक कर्मचारी अपने बीवी-बच्चों के मुँह देखने को तरसने लगे हैं ।हद तो तब हो गई जब खबर आई कि स्कूलों से गायब होकर समाज-सेवा करने वाले मास्टर जी की लोकेशन अब पब्लिक और अफ़सरों की निगाह में होगी।सरकार कुछ ऐसा इंतजाम करने जा रही है जिससे बच्चों के अभिभावक केवल एक एसएमएस देकर मास्टर जी का ताजा हाल जान लेंगे।वे स्कूल की कक्षा के बजाय अपनी कक्षा कहाँ चला रहे हैं,यह रहस्य अब खुलकर रहेगा।
कुछ जानकार बता रहे हैं कि मास्टर जी की वास्तविक लोकेशन उनके मोबाइल से पता की जाएगी  तो कुछ अनुभवी कह रहे हैं कि इस योजना में झोल हो सकता है।मास्टर जी ऐसी परिस्थिति में मोबाइल का अपनी देह से त्याग कर सकते हैं।इसलिए ज़रूरी है कि उनकी बाजू में ही एक चिप परमानेंटली फिक्स कर दी जाय।इससे उनकी कार्यालयी ही नहीं पारिवारिक समस्या भी काफ़ी हद तक हल हो जाएगी।घरवाले भी मास्टर जी की तरफ़ से बेफिक्र हो जाएँगे।अगर यह योजना ठीक से सिरे चढ़ती है तो मास्टर जी का सिरदर्द बढ़ने वाला है।उनकी सबसे बड़ी परेशानी तो यह होगी कि ऐसे में वह प्रिंसिपल साहब की सेवा-संभाल कैसे कर पाएंगे ? अभी तक मास्टर जी प्रिंसिपल साहब की,मॉनिटर बच्चों की और प्रिंसिपल साहब मास्टर जी की सालाना गोपनीय रिपोर्ट की अच्छी तरह से संभाल कर रहे थे ।
कल्पना कीजिए,जब स्कूल में मास्टर जी फेसबुक में अपनी नई फोटो ठेल रहे होंगे या नया स्टेटस अपडेट कर रहे होंगे,उनका अपना सार्वजनिक अपडेट हो जायेगा।पैरेंट्स को यह जानने में दिलचस्पी होगी कि मास्टर जी स्कूल आए हैं या आकर भी नहीं आए हैं ।हो सकता है कि मास्टर जी पान,पुड़िया और खैनी के लिए जैसे ही स्कूल चौहद्दी के बाहर निकलें,इस बारे में अभिभावकों के पास मैसेज पहुँच जाए।मास्टर जी की तरह यदि कोई अभिभावक भी निठल्ला हुआ तो वह उनसे कल्लू पानवाले की दुकान में ही मुलाक़ात कर लेगा।इस दुर्लभ भेंट से जो रिजल्ट निकलकर आएगा, अफसरों के बड़े काम का होगा.
जिसने भी सरकार को इस तरह का आइडिया दिया है,वह निश्चित ही कोई बाबू होगा।माना यही जाता है कि बाबू हमेशा मास्टरों के खिलाफ़ रहे हैं।इसका कारण है कि उनकी तुलना में मास्टरों को मोटा वेतन मिलता है ।यह क्या बात हुई कि ऑफिस में आठ-नौ घंटे तो बाबू खटे और महज़ पाँच-छः घंटे में मास्टर जी उनसे ज्यादा पगार झटक ले जाएँ ! वैसे भी पढ़ाना कोई काम नहीं है।पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और न देश की जीडीपी।राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले मास्टर जी के रहते देश की यह हालत ! समाज के लिए खतरनाक बन चुके ऐसे प्राणी को सबक सिखाने के लिए सरकार को  कोई न कोई अरेंजमेंट तो करना ही था।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

सौ दिन अफवाह के !

सरकार ने बड़ी हँसी-ख़ुशी सौ दिन पूरा कर लिए हैं।ये दिन उपलब्धियों भरे रहे हैं, पर कुछ मोतियाबिंद के मरीजों को ‘अच्छे दिन’ फिर भी नहीं दिखाई दे रहे हैं सो उनके लिए एक फ़िल्म बनाई गई है।सरकार को तो शुरू से ही पता था कि वह सौ दिन अवश्य पूरा करेगी,इसलिए सभी मंत्रियों को समुचित मन्त्र दे दिए गए थे।पहले वाली सरकार नादान थी.वह मंत्रियों को एजेंडा देती थी, जो कभी भी पूरा नहीं हो सकता था।इससे जनता यही समझती कि सरकार निकम्मी है।नई सरकार बेहद चतुर और सतर्क है,इसलिए उसने काम के बजाय शासन के मन्त्र बाँटे हैं ।इन मन्त्रों का जाप करके सौ दिन क्या पूरे पाँच साल बिताये जा सकते हैं।
जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है,यह बात सरकार अच्छी तरह से जानती है।चुनावों से पहले  लगता था कि मंहगाई,भ्रष्टाचार और बलात्कार जैसी समस्याएँ देश को ख़त्म करके रख देंगी।लेकिन देखिये,’अच्छे दिनों’ की छाँव तले जब सौ दिन पूरे हुए हैं,देश बचा हुआ है पर समस्याएँ छूमंतर हो गई हैं।इतने कम दिनों में जब इतना बदलाव महसूस किया जा सकता है तो पूरे पाँच साल में और उसके बाद अगले पाँच साल में देश का पूरा इतिहास ही बदल जायेगा।
अब टीवी और अख़बार में शिक्षा,बेरोजगारी और कुशासन पर ज्यादा चर्चा सुनने को नहीं मिलती।इससे सिद्ध होता है कि देश के लिए ये समस्याएँ रही नहीं।अब धर्म,संप्रदाय,जिहाद पर फोकस किया जा रहा है क्योंकि यदि बदलाव होना है तो सभ्यता और संस्कृति का हो। जब सारी समस्याएँ इन्हीं से जुड़ी हैं तो जाहिर है,इसमें समय लगेगा।सरकार जनता से वह समय स्वयं ले लेगी।इतना तो उसका भी हक़ बनता है।।इसलिए सरकार का ढोल बज रहा है और आपको नहीं अच्छा लगता है तो आप अपने कान बंद कर लीजिये।
इतनी सारी उपलब्धियाँ इतने कम समय में मिलना एक दुर्लभ घटना की तरह है।सरकार की शुरुआत में ही कुछ विद्वेषीजन छींकने लगे थे,तभी उसने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि उसे हनीमून पीरियड के लिए कम से कम सौ दिन चाहिए।सब यही समझ भी रहे थे कि सरकार का हनीमून पीरियड चल रहा है मगर सौ दिन आते-आते अंदर से अफवाह निकल आई ।अभी तक यह नहीं पता चल पाया है कि यह अफवाह ‘अच्छे दिनों’ को लेकर है या हनीमून के बारे में।कुछ लोग इसे बुजुर्गों का शाप बता रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि यह महज़ अफवाह है।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...