रविवार, 24 सितंबर 2017

ट्रोल-नाके से गुज़रने का अनुभव !

सोशल मीडिया पर टहल रहा था।अचानक कई जगह अलग-अलग वैरायटी की गालियाँ दिखाई दीं।मन ख़ुश हो गया कि हम किसी दूसरी दुनिया में नहीं पहुँचे हैं।यहाँ भी हमारे गली-मुहल्ले का-सा अपनापा है।वही तू-तू,मैं-मैं,वही मौलिक अभिव्यक्ति।गालियों के मामले में क्या पढ़े-लिखे और क्या अनपढ़ ! इस कला में सभी दक्ष दिखते हैं।सोशल मीडिया अब इसके लिए कोचिंग सेंटर का काम कर रहा है।लोग यहीं निपट रहे हैं,निपटा रहे हैं।वेस्ट-मैनेजमेंटका सबसे बढ़िया उदाहरण है यह।हर प्रकार का कूड़ा यहाँ खप जाता है।वो भी बिलकुल मुफ़्त में।अन्तर्जाल में गालियों पर शोधपत्र छापे जा रहे हैं।कुछ ने तो डॉक्टरेट भी कर रखी है।ऐसे प्रशिक्षित लोग जब सोशल मीडिया में उवाचते हैं,नई पीढ़ी दनादनलाइककरती है।नित नई गालियाँ गढ़ी जा रही हैं।इस तरह हिंदी का शब्दकोश दैनिक रूप से समृद्ध हो रहा है।अंततः इसरचनात्मकतासे हमारी मातृभाषा को ही संबल मिलेगा।गालियों के मामले में हम आत्मनिर्भर हों,यह बेहद ज़रूरी है।आख़िर कब तक हम आयातित गालियों से काम चलाते रहेंगे ? अंग्रेज़ी गाली सब बुद्धिजीवी समझते भी कहाँ हैं !

मनुष्य मौलिकता में रहना पसंद करता है।तभी वह अधिक सहज रह पाता है।पर क्या करे,आजकल एक चेहरे से काम भी नहीं चलता।घर और बाहर अलग-अलग अवतार धरने पड़ते हैं।गालियाँ आदमी को उसकी स्वाभाविक स्थिति में लाने में सबसे अधिक सहायक होती हैं।आदमी अपने मूलरूप में तभी आता है या तो उसका गला सोमरस से तर हो या क्रोध को उसने अपने गले में स्थायी रूप से टाँग रखा हो।यदि वह सभ्य गाली देता भी है तो यह सब वह मौलिकता के लिए करता है।और मौलिक होना सबसे बड़ा लेखकीय गुण है।

सोशल मीडिया पर घूम ही रहा था कि एक जाने-माने बुद्धिजीवी कीपोस्टसे टकरा गया।पोस्ट ऑलरेडी वायरल हो चुकी थी।मैं कब तक बचता,सो उसकी चपेट में मैं भी गया।ख़ूब बमचक मची हुई थी।उस सोशल-मीडिया कर्मी ने गाली को एक नया साहित्यिक आयाम दिया था।प्रचलित गालियों से बिलकुल हटकर प्रयोग था।बहुत सारे लोग शब्दकोश के हवाले से नए-नए अर्थ बता रहे थे।वहाँ हो रहे विमर्श से पता चला कि वे भूतपूर्व लेखक हैं।अपने समय में उन्होंने लिखा तो ख़ूब पर पाठक ही उनके लिखे को समझ नहीं पाए।लेकिन जबसे वे यहाँ सक्रिय हुए हैं,उनका पुनर्वास हो गया है।उनके बड़े-बड़े उपन्यास सामान्य-सी हलचल नहीं पैदा कर पाए और यहाँ एक पंक्ति भी ट्रेंड करने लगती है।वे आधुनिक क्रांति-दूत बन गए हैं।उनके चिंता व्यक्त करते ही हज़ारों फ़ॉलोअर्स कट मरते हैं।माहौल से अनजान हमने उनकीउससाहित्यिक-गाली की कड़ी निंदा कर दी।फिर क्या था,कई लोग मुझ अलेखक़ पर टूट पड़े।मुझे तुरंत ग़ैर-साहित्यिक और असहिष्णु क़रार दे दिया गया।एक सज्जन ने तो मेरे पिछले जन्म की बक़ायदा पूरी कुंडली ही खोल दी।इससे फ़ौरी लाभ यह हुआ कि हमें अपने पुरखों की वो सब बातें मालूम हुईं ,जिनसे मैं अब तक बिलकुल अनजान था।

तभी अचानक हमारी संदेश-पेटी चमकने लगी।मैं चैट-बॉक्स की ओर मुख़ातिब हुआ।एक नए गालीबाज़ ने अपनी श्रद्धानुसार मेरा स्वागत किया।हमने पूछा कि आप मेरा ऐसा अभिनंदन क्यों कर रहे हैं ? मैं तो पूरी तरह अभी बुद्धिजीवी भी नहीं बना हूँ।उसकी तरफ़ से जवाब आया-‘मैं तुम्हेंट्रोलकर रहा हूँ।मेरा यही कर्म और धर्म है।तुम अभी सोशल मीडिया के लिए नए हो।कहाँ और किस बात पर क्या कहना है,यह तुम्हें सीखना होगा।मैंने डरते हुए पूछायहट्रोलक्या बला है ? मैं तो केवल अभी तक टोल-टैक्स के बारे में ही जानता हूँ।हर नाके पर हमेशा देता भी हूँ।कहने लगा-‘ट्रोल मतलब नाक में दम करना।हम बिना किसी हिंसा के अपना शिकार करते हैं।उसे मारते नहीं केवल घसीटते हैं।इस बीच यदि वह मर जाए तो यह उसकीअसहिष्णुताहै।पर यह कभी-कभी होता है।सामान्यतः हम जिसेट्रोलकरते हैं उसे उसके खोल में पहुँचाकर दम लेते हैं।’ 

मगर मैंने ऐसा क्या अपराध कर दिया ? अपने विचार ही प्रकट किए हैं।आख़िर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसीलिए तो है ! ’ मैंने मुँहतोड़ जवाब दिया।

ऐसा लगता है उसे मुझसे ऐसे जवाब की उम्मीद पहले से थी।तुरंत उसकी तरफ़ से एकसभ्यगाली आई।साथ में सनसनाता हुआ संदेश भी-‘अभिव्यक्ति की यही आज़ादी मुझे भी हासिल है।तुम इस फ़ील्ड में नए हो,इसलिए ज़रा हल्का स्वागत किया है।इस बार तो इनबॉक्स में ही छोड़ रहा हूँ।आइंदा घर में घुसकरट्रोलकरूँगा।हमें घरेलू अनुभव काफ़ी है।घरेलू-हिंसा के तीन केस पहले से चल रहे हैं।तुम मेरा काम मत बढ़ाओ।मैं अब तक उसहल्कीगाली के सदमे से ही बाहर नहीं पाया था,तभी पीछे से श्रीमती जी की आवाज़ आई,‘बस भी करो चैटिंग ! कुछ लिख-पढ़ भी लिया करो।मैं उनसे कैसे कहता कि भागवान,यह सब लिखने-पढ़ने का ही नतीजा है !

इसके बाद सोशल मीडिया से मैं लॉग-आउट होने ही वाला था कि दूसरे बुद्धिजीवी ने कबीर के हवाले से लिखा था,‘गाली आवत एक है,पलटत होत अनेकइसकी व्याख्या करते हुए वे बता रहे थे कि यदिबाईंओर से एक गाली आती है तो पलट केदाहिनीओर से अनेक गालियाँ बन जाती हैं।तभी समाज में संतुलन बना रहता है।इसके आगे की व्याख्या मैं पढ़ नहीं सका,हाँ तब तक उनकी पोस्ट और उसमें आईं भद्रजनों की संस्कारी-गालियाँ वायरल हो चुकी थीं।मैं वहाँ से झट बाहर निकल आया ,लेकिन लग रहा है कि मैं ट्रोल-नाके से अभी-अभी गुज़रा हूँ !


संतोष त्रिवेदी

रविवार, 6 अगस्त 2017

काश,हम भी आलसी होते !

हाल ही में एक निष्कर्ष सामने आया है कि हम भारतीय बड़े आलसी होते हैं।इस अनोखी उपलब्धि की जानकारी हमें तो बहुत पहले से थी,पर दुनिया ने अब जाकर हमारा लोहा माना है।हम मानते हैं कि आलस्य का अपना सौंदर्य होता है।इस बारे में वे बेचारे नहीं जान सकते,जिन्हें इसका कभी सुख नहीं मिला हो।हम तो बचपन से ही आलसी बनना चाहते थे पर कबीर साहब ने ऐन वक़्त पर हमें रोक दिया।स्कूल में हिन्दी के मास्टर साहब ने बताया कि कबीर कहते हैं कि जो काम कल करना हो,उसे आज करो।और जो आज करना हो,वह अभी।संस्कृत वाले आचार्य जी ने तो आलसी होने के तमाम फलित भी बता डाले थे ;`अलसस्य कुतो विद्या,अविद्यस्य कुतो धनं,अधनस्य कुतो मित्रं,अमित्रस्य कुतो सुखं'अर्थात् आलसी को विद्या नहीं मिल सकती।बिना विद्या के धन नहीं,बिना धन के मित्र नहीं और बिना मित्र के सुख नहीं।ये हमले दरअसल आलस्य पर नहीं सीधे हमारी अंतरात्मा पर हुए।इसके बाद हमने कोई और आवाज नहीं सुनी।बस इन्हीं उपयोगी सूत्रों के चक्कर में अपनी संभावित प्रगति बाधित कर डाली।सुख की कामना में आलस्य के स्थायी शत्रु बन बैठे।और आज हाल यह कि सुख हमारा स्थायी दुश्मन बन गया है।आलसी जहाँ रात में भरपूर नींद के बाद दिन में भी अलसाने का सुख उठा लेते हैं,हम रात भर जागते और दिन भर भागते रहते हैं।अनिद्रा के शिकार हो गए हैं क़सम से।

एक कट्टर आलसी को तो हमने इन्हीं जागती आँखों से फलते-फूलते देखा है।मेरे साथ ही गाँव के हाईस्कूल में पढ़ता था।आलस्य से पंगा लेकर मैंने लालटेन जला-जलाकर पूरे साल पढ़ाई की और स्कूल में अव्वल आया था।वहीं हमारे लंगोटिया यार को पढ़ाई से ज़्यादा आलस्य से प्यार हो गया।इतना कि ऐन इम्तिहान के दिन वह निद्रादेवी की गोद में सशरीर समा गया था।उसकी डेस्क को इसके लिए उस दिन भारी शर्मिंदगी उठानी पड़ी।इस घटना का तात्कालिक असर यह हुआ कि उसके ठेकेदार पिता ने पढ़ाई जैसे नीरस और अनुपजाऊ काम से उसे तुरंत खींच लिया।थोड़े दिन बाद ही उसके पिता स्थानीय जनता के दुःख-दर्द बाँटने के कार्यक्रम में लग गए।जब यह ‘बँटवारा’ बढ़ने लगा तो अपने प्रोजेक्ट में बेटे को भी उन्होंने शामिल कर लिया।नतीजा यह हुआ कि वह दोस्त आज उस महकमे का मंत्री है,जिसमें हम बड़े बाबू हैं।आलस्य से दुश्मनी करके आज हम फ़ाइलों के ढेर पर बैठे हैं और वह अँगूठा दबाकर राज्य की नित-नई योजनाएँ पास कर रहा है।

इस घटना का ही असर है कि अलसाए हुए लोग मुझे अच्छे लगने लगे।उन्हें किसी बात की जल्दी नहीं रहती।वे ट्रेन पकड़ने के मामले में भी इतने ही प्रतिबद्ध होते हैं जितने दैनिक रूप से कार्यस्थल पहुँचने में।प्लेटफ़ॉर्म में वे पहुँचते तभी हैं,जब गाड़ी रेंगने लगती है।इससे वे उबाऊ प्रतीक्षा से साफ़ बच जाते हैं।

देश में आलस्य वाले बहुमत में हैं।अपनी इसी आदत के कारण वे देश-सेवा का भी लाभ उठा लेते हैं।मतदान के दिन घर से बाहर ही नहीं निकलते।केवल तीस-बत्तीस फ़ीसद लोगों के वोट से सरकार बन जाती है।आलसियों के लिए सार्वजनिक छुट्टी बच्चों संग एंजॉय करना देश से बड़ी सेवा है।इससे चुनाव जीतने के लिए नेताजी को ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती।सारे आलसी यदि वोट देने निकल आएँ तो जो सरकार बनेगी,वह भी आलसी होगी।और एक अलसाई हुई सरकार न विकास पैदा कर सकती है ,न ताबड़तोड़ विदेश यात्राएँ।इसलिए देश की प्रगति में आलसियों का सबसे बड़ा योगदान है।
आलसी आदमी बड़ा संतोषी जीव होता है।उसके मन में न कुछ पाने की इच्छा होती है न कुछ उठाकर देने की।बैठे-बिठाए जितना उसे मिल जाता है,उसी में वह तृप्त हो लेता है।आलसी अध्यात्म और विज्ञान का एक साथ पक्षधर होता है।उसमें आला दर्जे की आस्तिकता होती है।ईश्वर-कृपा से जो मिल जाता है,उतना ही वह ग्रहण करता है।आलसियों की वजह से ऑनलाइन शॉपिंग का बाज़ार दिनोंदिन बढ़ रहा है।भारत में देशी-विदेशी कम्पनियाँ इन्हीं निठल्लों के चलते ख़ूब रोज़गार पैदा कर रही हैं।उनका पूरा टर्न-ओवर ही इन आलसियों के अस्तित्व पर निर्भर है।शुक्र है कि हर घर में ऐसे महत्वपूर्ण प्राणी होते हैं।यहाँ तक कि विज्ञान की कई खोजें आलसी-फ़्रेंडली हैं।चाहे देश में क्रान्ति का मामला हो या घर की शांति का,पाँच इंच के एक स्मॉर्टफ़ोन से वह दोनों मसले तुरत हल कर डालता है।

आलसी ग़ज़ब का तार्किक होता है।ग़लती से कोई भी कर्म उसके कर-कमलों द्वारा पुण्य-लाभ न ले जा पाए,इसके ठोस कारण उसके मुखारविंद में हमेशा मौजूद रहते हैं।असली आलसी हरदम पॉज़िटिव सोचता है।उसे यही लगता है कि आख़िरी मौक़े पर कोई न कोई चमत्कार ज़रूर होगा।किसी काम को पूरा करने के लिए उस पर लोग भले विश्वास न करते हों,पर उसके पास ग़ज़ब का आत्मविश्वास होता है।जहाँ दूसरे लोग ‘समय बड़ा क़ीमती है’ नामक फोबिया से हमेशा पीड़ित रहते हैं और समय को लेकर बड़े संवेदनशील होते हैं,वहीं आलसी बिलकुल बेपरवाह।समय ख़ुद कई बार ‘अलार्म’ बजाकर उन्हें झिझोड़ता है पर वे कभी भी अपने ऊपर किसी तरह के ख़तरे का ‘लोड’ नहीं लेते।वे अधिकतर काम अपनी मानसिक-मिसाइल से ही ध्वस्त कर देते हैं यानी ‘मन’ से काम करते हैं।शायद इसीलिए दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बिल गेट्स का मानना है कि मुश्किल काम के लिए वे आलसी व्यक्ति को चुनना पसंद करेंगे।तो यह है आलसियों की मार्केट-वैल्यू ! सरकार भी यह बात बख़ूबी जानती है।इसीलिए आलसी को परमानेंट-तैनाती मिलती है और हम जैसे कामकाजी दर-बदर घूमते हैं।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...