रविवार, 5 फ़रवरी 2023

अमृत-काल का तिलिस्मी बजट

बजट का दिन था।सुबह से ही पेट में अफ़रा मचा था।‘कर्तव्य-पथ’ की झाँकी देखने के बाद हमारा यह दूसरा कर्तव्य था,जब हम बुद्धू-बक्से पर आँखें गड़ाए बैठे थे।साथ में भरोसे दद्दू भी थे।वे बार-बार उचक रहे थे।हमसे ज़्यादा उन्हें इस मौक़े का इंतज़ार था।आख़िरकार सरकार जी ने अपनी पिटारी खोली।काफ़ी देर तक बड़ी गंभीर किसिम की बातें होती रहीं,जो हमारे भेजे में जाने को तैयार ही नहीं थीं।हमें तब भी भरोसा था कि गंभीर-मंथन से कुछ न कुछ तो निकलेगा ही।बजट आने से दो दिन पहले ही सरकार ने स्वयं हलवा चखा था।उसी हलवे का मज़ा अब हमें भी चखाएगी।यह सोच ही रहा था कि अचानक सत्ता-पक्ष की ओर से ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ पीटी जाने लगीं।तभी सरकार जी ने फट्ट से घोषणा कर दी कि हम ‘अमृत-काल’ में प्रवेश कर चुके हैं और यह ‘अमृत-काल’ का पहला बजट है।यह सुनकर हमारे साथ बैठे भरोसे दद्दू का बचा-खुचा भरोसा भी उठ गया,जो यह समझे बैठे थे कि ‘निर्मम’ सरकार का यह आख़िरी बजट है।इसी इंतज़ार में उन्होंने बहुत सारा ‘विष-पान’ किया है।‘अमृत-काल’ में वह चरस कैसे बोएँगे,अब यह बड़ी चिंता थी।


मेरी चिंता दूसरी थी।सारे कर देने के बाद भी जो आय बचेगी,उसका हम करेंगे क्या ? सरकार को इतनी भी छूट नहीं देनी चाहिए कि कर्मचारी अपनी आय से प्यार करना ही बंद कर दे।बहरहाल,हमने अपनी चिंता को परे धकेला और दद्दू की चिंता पर सवार हो गए, ‘आप तनिक भी मत घबराओ।विष-वर्षा का समय गया।अब केवल अमृत बरसेगा।हमने तो पहले ही आपसे कहा था कि यह सरकार बड़ी कारसाज है।कुछ बड़ा करेगी।इतने सालों में जो हुआ,अच्छा हुआ।देख लीजियेगा,इस अमृत-काल में मँहगाई और बेरोज़गारी को सिर छुपाने की जगह भी नहीं मिलेगी।अब आप जो भी ‘विष-वमन’ करेंगे,वह अमृत हो जाएगा।’ हम दद्दू की हौसला-अफ़ज़ाई कर ही रहे थे कि विपक्षी-ख़ेमे की तरफ़ से सदन में हो-हल्ला शुरू हो गया।यह देखकर भरोसे दद्दू के प्राणों में नव-संचार हो गया।उन्हें लगा कि उनके ‘विषाधिकार’ पर कोई तो है,जो आवाज़ उठा रहा है।इधर हमें हलवे का स्वाद कसैला लगने लगा।हम भारी असमंजस में थे।दद्दू इधर-उधर टहलने लगे।सुकून उन्हें भी नहीं मिल रहा था।हम चैनल-चैनल भटकने लगे।कहीं भी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी।अचानक एक चैनल पर हम दोनों की निगाह बर्फ़ की तरह जम गई।


ग़ज़ब दृश्य था।आसमान में एक मचान बँधा हुआ था।चार चैनल-चंचलाएँ चर्चा को शिखर पर ले जाने को बेताब थीं।तीन विशेषज्ञ कमर में बजट को पेटी की तरह बाँधे हुए दिख रहे थे।दस कैमरे ज़मीन पर और पंद्रह मचान पर तैनात थे।चैनल का दावा था कि उसकी सतर्क निग़ाह से अब कुछ नहीं बचेगा।बजट की क्या मजाल जो उससे रत्ती भर भी बच जाए ! उनका चैनल हवा में बातें ही नहीं करता,देखता भी है।हवा से ही उनकी टीम ज़मीनी सचाई परख लेगी।हमारी नज़रें उसी चैनल पर टिकी रहीं।बहुत बाद में यह मालूम हुआ कि हम देख भी रहे हैं ! 


एक समाचार-सुंदरी ने हमारा बजट-बोध कराते हुए कहा, ‘अमृत-काल’ में पेश किया गया यह ऐतिहासिक बजट है।इसकी चर्चा के लिए हमारे पास अलग-अलग दृष्टि रखने वाले विशेषज्ञों का पैनल है।जो सबसे बाईं ओर बैठे हैं,उनके पास ‘विकट-दृष्टि’ है।इन्हें अपने आसपास विकट के सिवा कुछ नहीं दिखता।जो सज्जन बीच में विराजमान हैं,उनके पास ‘गिद्ध-दृष्टि’ है।इनकी विशेषता है कि इन्हें बहुत दूर का दिखता है,पास का बिलकुल नहीं।और आख़िर में दाईं ओर जो महामना तनकर बैठे हैं,उन्हें ‘दिव्य-दृष्टि’ प्राप्त है।इनकी ख़ासियत है कि इन्हें वह भी दिखता है,जो होता ही नहीं।यह जो दिखाते हैं,लोग वही देखने लगते हैं।कुछ मूढ़ इसे चमत्कार कहते हैं पर यह इनकी योग-साधना है।


दूसरी चैनल-कन्या ने विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मेरा पहला प्रश्न विकट-दृष्टि जी से है।इस बजट को आप कैसे देखते हैं ?’ उन्होंने उँगली उठाते हुए कहा, ‘मैं इन लोगों से शुरू से ही कह रहा हूँ,पर इन्हें कुछ नहीं दिखता।यह बजट गरीब-विरोधी है।अगर सरकारी दावे के हिसाब से ग़रीबी दूर होगी तो बताओ,गरीब कहाँ जाएगा ? इसलिए यह बजट भी इनके वादों की तरह झूठा है।’


‘और आपकी इस पर क्या राय है ? आप ‘अमृत-काल’ के आगमन पर क्या सोचते हैं ?’ चैनल-चंचला ने ‘गिद्ध-दृष्टि’ वाले सज्जन की ओर ताकते हुए पूछा।‘मुझे तो पिछले आठ सालों से दिख रहा है।चुनाव आता है।सरकार आती है।बजट आता है।इसमें नया क्या है ? रही बात ‘अमृत-काल’ की,तो यह सरकार की साज़िश है।वह इसी बहाने अमृत पीकर अमर होना चाहती है।मैं तो देख रहा हूँ कि आगे चुनाव ही नहीं होंगे।’


यह सुनते ही ‘दिव्य-दृष्टि’ वाले सज्जन एकदम से उखड़ गए।मचान का एक पाया उखाड़कर वे कहने लगे,‘यह राष्ट्र-बजट का घोर अपमान है।कोरोना-काल के बावजूद सरकार अमृत-काल खींच लाई है,यह कम उपलब्धि है ?’ यह सुनते ही बाक़ी दोनों सज्जन पेटी खोलकर खड़े हो गए।इससे विमर्श में संतुलन बिगड़ गया।पूरा चैनल ज़मीन पर आ गिरा।मचान टूट गया पर बजट का तिलिस्म नहीं टूटा।ग़नीमत रही कि किसी की हड्डी नहीं टूटी।दद्दू बोले, ‘यह अवश्य ही अमृत-काल का प्रताप है।’


बाद में अख़बार में पढ़ा कि अमृत-काल के पहले बजट को अब घर-घर जाकर समझाया जाएगा।


संतोष त्रिवेदी 


रविवार, 8 जनवरी 2023

इस अँधेरे को हमारे पास रहने दो !

अँधेरे को लेकर कभी एक राय नहीं रही।ज़्यादातर लोग इसे अच्छा नहीं मानते या इससे डरते हैं।पर बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जिनको अँधेरे से ही मुहब्बत है।यह साहित्य और राजनीति दोनों जगह हिट है।जितना घना अँधेरा हो,कविता में उतनी ही अधिक उजास होती है।इसे प्रतीक मानकर न जाने कितना साहित्य रचा जा चुका है।इसके बाद भी इसके गुणों का बख़ान पूरा नहीं हो पाया।आज भी कई कवि इसी अँधेरे को बेचकर ख़ुद के लिए उजाले का इंतज़ाम कर लेते हैं।अँधेरे पर लिखी गई कविता एक साथ कई निशाने साधती है,इसलिए कवियों की पहली पसंद अँधेरा ही है।वे कभी नहीं चाहते कि इसका अस्तित्व समाप्त हो।एक प्रमुख कवि ने तो अँधेरे पर सबसे लंबी कविता लिखी थी।शायद उनको बोध हो गया था कि उनकी मुक्ति अँधेरे से ही होगी।


काव्य में अँधेरे की ऐसी घुसपैठ के चलते मेरी धारणा इसके प्रति औरों से अलग रही।मैंने इसे कभी नकारात्मक रूप से नहीं लिया।मेरे जीवन में जब भी घना अँधेरा छाया,मैं चिंतामुक्त हो गया।उजास को मजबूरन मेरा दामन पकड़ना पड़ा।इसलिए मेरे लिए तम की काली छाया हमेशा आशावाद की सूचक रही।जब तक मैं उजाले में रहा,डर में रहा,अँधेरे का अवसाद रहा।इस तरह मैंने जाना कि मेरी सहज और स्वाभाविक स्थिति अँधेरा ही है।इसलिए साहित्य में मैंने हमेशा अँधेरा फैलाया।जिस काम के लिए मुझे प्रशंसा मिलनी चाहिए,उसके लिए कुबुद्धिजीवियों ने मुझे लानत भेजी।फिर भी मैं अपने पक्ष पर दृढ़ता से डटा रहा।कम से कम यह इस बात का प्रमाण है कि मैं उच्चकोटि का विचारक और बुद्धिजीवी तो हूँ ही।


साहित्य के माध्यम से समय-समय पर ‘अँधेरे से उजाले की ओर’ का आह्वान यूँ ही नहीं किया गया।अधिकतर लोग इसे उजाले की प्रतिष्ठा के रूप में देखते हैं पर वे इसके पीछे के रहस्य को अनदेखा कर जाते हैं।सीधा मतलब है कि उजाले में आने के लिए पहले अँधेरा पैदा करना ज़रूरी है।इसलिए हमें उन तमाम लोगों का आभारी होना चाहिए जिनके ‘सद्प्रयासों’ से साहित्य,राजनीति,धर्म,कला सहित समाज के सभी क्षेत्रों तक अँधेरे का समुचित प्रसार हो सका।प्राचीन काल से ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का पाठ भी इसकी तस्दीक़ करता है कि प्रकाश की ओर जाने का रास्ता अँधेरे से ही निकलता है।



राजनीति को भी साहित्य की तरह अँधेरा अधिक पसंद है।इसकी मुख्य वजह अँधेरे का काला होना है।कालेपन की ख़ासियत है कि इस पर कोई दाग नहीं लगा सकता।आज के समय में सफ़ेद होना सबसे ख़तरनाक है।पता नहीं,कब कोई उसकी सफ़ेदी को सरेआम काला कर दे।इसलिए अब राजनीति में वही लोग प्रवेश करते हैं,जिन्हें ‘सफ़ेदी’ से एलर्जी होती है।वे राजनीति में बाय-डिफ़ॉल्ट काले और दाग़ी ही आते हैं।इससे भविष्य में उनके दाग़दार होने का अंदेशा भी नहीं रहता।राजनीति के लिए अँधेरा होना बेहद ज़रूरी है।लोगों की ज़िंदगी से इसी को मिटाने का बार-बार संकल्प लिया जाता है।इस चक्कर में ज़िंदगी मिट जाती है,पर अँधेरा बचा रहता है।इसके सहारे चुनाव जीते जाते हैं।रोशनी का सपना दिखाया जाता है।चुनाव संपन्न होते ही उजाला फटता है।लोगों की तकलीफ़ का प्रमुख कारण यही साबित होता है।लोग फिर से अपने अँधेरे को याद करते हैं और वह तुरत हाज़िर होता है,जैसे कहीं गया ही न हो ! यह अजर-अमर है।सदियों से है,सदियों तक बना रहेगा।इसलिए सबका ध्येय वाक्य है ‘अँधेरा क़ायम रहे !’


बात अँधेरे की हो तो कालिमा या कालिख़ के बिना अधूरी रहेगी।जितनी ज़्यादा कालिख़ पुतती है,अँधेरे की गुंजाइश बढ़ जाती है।जितना उजला और झक सफ़ेद हो,उस पर उतनी ही कालिमा फबती है।काले कारनामे में एक-दो बार कालिख और पुत गई तो क्या फर्क पड़ता है ! कालिमा इसीलिए सहज होती है और मौलिक भी।उजले और धुले वस्त्र अंततः कालिख की गति को ही प्राप्त होते हैं जबकि कालिमा कभी भी धवल और उज्ज्वल नहीं हो सकती।सूरदास जी बहुत पहले ही यह कह गए हैं, ‘काली कामरी में चढ़े न दूजो रंग’।अँधेरे का काला रंग बाक़ी सभी रंगों को आत्मसात कर लेता है,इसीलिए इसकी महत्ता है।सब इसे ओढ़ना चाहते हैं।


समाज की सारी विशिष्ट कलाएं इसी की शरण में फलती-फूलती हैं।सबसे बड़ा समाजवाद अँधेरे का होता है।इसमें छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं रहता।न किसी का सूट-बूट दिखता है न यह कि कौन लंगोटी में है ! अँधेरा गरीब का पक्षधर है।उसके खाली पेट को ढाँपता है।अमीर को और समृद्ध होने की राह दिखाता है।काला इसीलिए सबका अभीष्ट है,फ़िर चाहे वह धन हो या मन।अँधेरे की जड़ में यही काला रंग है।इससे उपजी कालिख़ संभावनाओं के नये द्वार खोलती है।कालिख लगना कलियुग का प्रताप है।जिसे लग गई वह देश का भविष्य बन जाता है।इसलिए कालिख से नहीं उजाले से डरो।उजाला विकास का शत्रु है,भेदिया है।और भेदिये देशद्रोही होते हैं।


इसलिए जब भी अँधेरा छँटे,सतर्क हो जाओ।उजास दुःख देता है,सपने भी नहीं लेने देता।अँधेरा हो तो आदमी,कुछ नहीं,सपने तो देख ही सकता है,उम्मीद पाल सकता है,प्रतीक्षा करना सीख जाता है।अब इससे ज़्यादा अकेला अँधेरा इस आदमी के लिए और क्या कर सकता है !


सोमवार, 2 जनवरी 2023

नए साल का नया बदलाव

हम पता नहीं किस चिंता में खोए हुए थे कि नया साल एकदम से आकर हमारी छाती पर बैठ गया।कहने लगा,हमारा स्वागत नहीं करोगे? लेखक होकर भी बड़े संवेदनहीन हो ! दुनिया हमारे आने का जश्न मना रही है और तुम्हें जैसे कोई ख़बर ही नहीं।अपनी रज़ाई से बाहर निकलो और देखो तब तुम्हें पता चले कि नए साल में क्या-क्या बदल गया है।


अचानक हुए इस हमले से मैं हड़बड़ा गया।रज़ाई को और मज़बूती से अपनी ओर खींचते हुए बोला, ‘कैलेंडर ही तो बदला है।जैसे दिन और महीने बदलते हैं,वैसे ही तुम बदले हो।ज़्यादा-से ज़्यादा तेल और दूध के दाम बदले होंगे।रोज़ बदलते हैं।इसमें नया क्या है ? वैसे भी मुझे बदलाव से चिढ़ है।ख़ासकर लोगों के बदल जाने से।बदल जाने वाले लोग बेवफ़ा होते हैं।हम कोई चुनावी-वादा या डॉलर का रेट नहीं हैं जो पलक झपकते बदल जाएँ ! अगर कुछ बदलना है तो देश बदले।ईवीएम मशीन बदले।सरकार बदले।मगर वो भी तो नहीं बदलेगी इस साल।मुझे तो अगले साल भी ज़्यादा उम्मीद नहीं दिखती।ऐसे में हम किस बात का जश्न मनाएँ ? हमसे बदलने की उम्मीद तो करो मत।हम लेखक हैं।बदलाव का आह्वान करते हैं,ख़ुद बदलते नहीं।’


यह सुनते ही नया साल ज़ोर से हँसा, ‘तुमने बदलाव के विरुद्ध जितने तर्क़ दिए हैं,सब बेकार हैं।इतनी मेहनत ख़ुद को बदलने में करते तो अब तक ‘अकादमी’ पा जाते।बिना बदले प्रगति नहीं होती,यह छोटी-सी बात तुम्हारे भेजे में नहीं आई ? सच तो यह है कि तुम बदलना नहीं चाहते।तुम जड़ थे और जड़ ही रहोगे।चेतन बनो,भगत नहीं।तुम केवल लिखते हो,अमल नहीं करते।हम हर साल इसलिए आते हैं कि कुछ बदले न बदले,कैलेंडर तो बदल जाए।इसीलिए लोगों को सरकार के बजाय साल के बदलने का इंतज़ार रहता है।उन्हें हम उम्मीद बेचते हैं।तुम हमारी मार्केटिंग पर पलीता मत लगाओ।बदलाव को मन से स्वीकार कर लो।ट्रेंड के साथ चलो।पुरानी धारणाओं को तिलांजलि दे दो।आओ,दोनों मिलकर नया इतिहास बनाएँ।’ नया साल खुलकर जबरजस्ती पर उतर आया।


उसके इस आह्वान से मैं अंदर तक हिल गया।एक पल को लगा कि मेरी सारी जड़ता टूट जाएगी पर अगले ही पल ख़ुद को सँभाल लिया।तरकश में अभी कई तीर थे।हमने नए साल पर नई निग़ाह डालते हुए कहा, ‘मेरे बदलाव की बात छोड़िए।मेरे बदलने से क्या होगा ? बाक़ी सब तो बदल ही रहा है।बीते सालों में इतिहास बदल गया,मँहगाई का अर्थशास्त्र बदल गया।बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार पर संकुचित सोच भी बदल गई।अपराधी से ज़्यादा उसका धर्म महत्वपूर्ण हो गया।नए साल में पहले बदलाव की आहट भी देख रहा हूँ।अब चड्डी-बनियान भी लूँगा तो ध्यान रखूँगा कि उसका ‘रंग’ बेशर्म वाला क़तई न हो।एक छोटी-सी चूक बड़ा दंगा कर सकती है।इसलिए ‘राष्ट्रीय दंगा-समिति’ वाले सज्जन से ‘सेंसर’ करवाने के बाद ही चड्डी खरीदूँगा।मेरे कुछ त्याग से यदि समाज में शांति स्थापित हो सकती है,तो ख़ुद को बदलने के लिए मैं तैयार हूँ।खाने-पीने और पहनने में इतना लिहाज़ तो होना ही चाहिए।हमें अब यमदूत से नहीं संस्कृति-दूत से डर लगने लगा है।इत्ता बदलाव काफ़ी नहीं है क्या ?’


यह सुनते ही नया साल मेरे गले से लिपट गया।वह मुझ पर बेतहाशा प्यार बरसा रहा था और मैं उस बेचारे पर दम घोटने का आरोप लगाने लगा।


संतोष त्रिवेदी 

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...