सोमवार, 30 सितंबर 2013

आधुनिक समय की क्रांति !

नईदुनिया में ३०/०९/२०१३ को


वे आराम से चादर तानकर सोये हुए थे।अचानक उन्हें लगा कि देश और संविधान ख़तरे में है सो वे क्रांति की अगुवाई के लिए उठ खड़े हुए।सार्वजनिक रूप से लोग उनके गायब होने की चर्चा लगातार करते रहते थे पर अब पता चला है कि दरअसल वे क्रांति करने के लिए हिम्मत जुटाने में लगे थे ।जैसे ही दागियों को बचाने वाला अध्यादेश संकट में फंसता दिखा,उनको क्रान्ति का आइडिया मिल गया।वे उस अध्यादेश को ढूँढते हुए प्रेस-कांफ्रेंस की ओर भागे।वहाँ अध्यादेश का गुणगान करने में लगे अपने प्रवक्ता से माइक लिया और एकदम से फट पड़े।उनके इस तरह सक्रिय होने से हर तरफ हल्ला मच गया।उन्होंने उस अध्यादेश को बकवास और उसे लाने वालों को नानसेंसघोषित कर दिया।वे इतने मूड में थे कि अगर बेचारा अध्यादेश उस वक्त मिल जाता तो उसकी चिन्दी-चिन्दी उड़ा देते ।बहरहाल,यह कमी उन्होंने सरकार के बचे-खुचे कपड़ों को तार-तार कर पूरी कर ली।इस तरह की हाइटेक क्रांति का बिगुल बजाकर वे उठ लिए ।

इस बीच मीडिया उनके दुर्लभ बोल रिकॉर्ड कर चुका था।बस,उनकी क्रान्ति यहीं तक थी।इसके आगे का काम सरकार और उनके सलाहकारों का है।वे फ़िर से अंतर्ध्यान हो गए हैं और उनकी सरकार किसी कोने-अतरे में अपना मुँह छिपाने का जतन करने में लगी है।

उनको पता है कि क्रांति कैसे की जाती है।जमाना बदल रहा है सो नए जमाने की क्रांति भी नए टाइप की होनी चाहिए।पहले कभी भले ही कठिन संघर्ष के साथ क्रांति की शुरुआत होती रही हो, लंबा समय लगता रहा हो,पर अब हाईटेक ज़माने में क्रांति भी हाईटेक हो गई है।जब भी अहसास हो कि बहुत दिन से क्रांति नहीं हुई,बस हो जाती है।इस मामले में उनका सीधा और शॉर्टकट फंडा है,’ आओ,फाड़ो और चले जाओ।उत्तम प्रदेश के पिछले चुनावों में उन्होंने मंच से ही विरोधी पार्टी का घोषणा-पत्र बड़े जोशीले तरीके से फाड़ा था।बाद में पता चला कि मतदाताओं ने वोटों से लबालब उनका बैलट-बॉक्स ही गुल कर दिया।उस कागजी-क्रांति से वे लगातार प्रेरित होते रहते हैं ।

देश में जब-जब जनता सड़कों पर निकली है,वे किसी खोह में बैठकर इस बात का शोध करने में लग जाते हैं कि कब और किस तरह सबके सामने आया जाए।जब दुखी जनता का दर्द उनसे नहीं देखा जाता तो कैमरों के उजाले में सहसा प्रकट होते हैं,कागज फाड़ते हैं और चल देते हैं।जब इसी तरह से क्रांति आ सकती है तो इसके लिए लम्बे आन्दोलन करना वाकई मूर्खता है ।

इस अचानक हुई क्रांति से सभी दागी हतप्रभ हैं।उनके साथ सबकी सहानुभूति है।उनमें कोई चारा खाए बैठा है तो किसी ने खदान गटकी हुई है ।कोई कोयला हजम किए हुए है तो कोई फाइलें खा गया है।राजनीति में इसी तरह का खाना है,वे तो बस किसी तरह जीवन-निर्वाह कर रहे हैं।ऐसी जनसेवा बेखटके हो सके ,इसके लिए जल्द से जल्द कदम उठाने ज़रूरी हैं ,पर अध्यादेश को फाड़कर क्रांति करने की उनकी ललक से दागी बेहद दुखी हैं।उनको लगता है कि वे अब जनसेवा कैसे कर सकेंगे ?

बुधवार, 25 सितंबर 2013

लो फ़िर आ गए हम !

जनवाणी में २५/०९/२०१३ को !

 

नुक्कड़ की तरफ बहुत दिनों बाद जाना हुआ तो वहां की बदली रंगत देखकर हम चौंक गए। फिज़ा काफ़ी बदली-बदली नज़र आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि पतझड़ के बाद वसंत आया हो ! सारी दुकानों में बदलाव की बयार थी और खूब चटख रंगों से दीवारें पुत रही थीं।  सभी की नाम-पट्टिकाओं में फेरबदल किया जा रहा था । सबसे ज़्यादा बदलाव दो दुकानों में था,क्योंकि वे सबसे बड़ी हैं और अधिकतम ग्राहकों को आकर्षित भी करती है। जहाँ एक दुकान के बोर्ड से नए मैनेजर के आने का संकेत मिल रहा था,वहीँ दूसरी दुकान ने अपने बुजुर्ग मैनेजर को हटा दिया था। उस पर आरोप था कि अब उसके पास माल बेचने का नुस्खा नहीं रहा। दोनों दुकानों के अन्दर ख़ास तबदीली तो नहीं दिख रही थी पर बाहर काफी रौनक थी। जिस दुकान के मैनेजर बदल गए थे,हम सबसे पहले वहीँ गए।

नए मैनेजर अभी-अभी वीडियो कांफ्रेंस करके आए थे। वे कई फाइलों को उलट-पुलट के देख  रहे थे। कइयों पर काफ़ी गर्द जमीं हुई थी और वे बहुत चिंता-मग्न लग रहे थे। हमने उनके पास पहुंचकर इस बदलाव का रहस्य जानना चाहा। वे बोले,’अगले ही साल इस इलाके का टेंडर उठना है और हमारी समस्या है कि इसमें बोली लगाने वाले कई लोग हैं।हमारे लोगों ने तो टेंडर-प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही नई फाइल को गोदी में उठा रखा है.... तो इसमें समस्या क्या है ?’ हमने बीच में ही बात काट दी। वे एकदम से बिफर पड़े,इस फाइल पर लगे भगवे कवर से हमारे कई साझीदारों का हाज़मा बिगड़ जाता है वहीँ दूसरी फ़ाइल बार-बार दाँव पर लगना चाहती है। वह बहुत पुरानी और परखी हुई है,रथ पर भी घूम चुकी है । कुछ और फाइलें हैं जो अभी दबी पड़ी हैं पर उनके भी ऊपर आने का अंदेशा है।  हमें टेंडर मिलने का अभी पुख्ता भरोसा नहीं है,फिर भी इतनी भारी संख्या में फाइलों के आने से हमारी दुकान के भरभराकर गिर जाने का खतरा बन गया था,तभी हमने एक खुल्लम-खुल्ला सर्कुलर जारी कर दिया है ताकि स्थिति स्पष्ट हो जाय ! इसमेंहालाँकि अंदेशा है कि  ऐसा करने पर बाकी फाइलें फट सकती हैं । पर हम भी मजबूर हैं और इसी को असली और मज़बूत फ़ाइल मान रहे हैं।

तब तक हमने देखा कि पहली दुकान के आगे अचानक चहल-पहल बढ़ चुकी थी। हम उधर की ओर ही चल दिए। दुकान के मैनेजर ने पास में रखी एक कोरी फाइल निकाली और सभी कर्मचारियों को हिदायत देनी शुरू कर दी। वे बोले,’इस फाइल को अच्छी तरह से तैयार किया जाए ताकि अगले साल का टेंडर फ़िर हमें ही मिले। इसके लिए जीतने भी लंबित आदेश हों,उन पर आखिरी नोट लिखकर अमल किया जाय। इस फाइल को सजाने के लिए आतंकवाद,बलात्कार और भ्रष्टाचार की पुरानी फाइलें त्वरित गति से निपटाई जांय। फांसी वाली फाइल तो इसमें नत्थी कर ही दीजिए,लोकपाल का झुनझुना और मंहगाई का सिलेंडर इसकी मुख्य नोटिंग में होना चाहिए। हमारे देखते-ही देखते कई लोग अचानक सक्रिय हो गए। थोड़ी ही देर में ही यह नई फाइल "भारत-निर्माण ' के लेबल के साथ दुकान के काउंटर में रख दी गई। इसके ऊपर-नीचे दूसरी फाइलों का कोई पेंच ही नहीं था,इसलिए इस दुकान का मैनेजर इस बारे में निश्चिन्त दिखा !

थोड़ी देर में बड़ा-सा झोला लादे एक कारिन्दा आया। उसने एक-एक कर कई चीज़ें झोले से निकाली और फाइल पर रखने लगा। हमने इसका कारण पूछा तो रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसने बताया कि आने वाले टेंडर को पाने के लिए इस थैले से निकली यह पूजा-पाठ की सामग्री है। अगर यह भेंट ठीक-ठाक हो गई तो दुकान का काम चल निकलेगा। इस पूजा में हम अपने घर से कुछ नहीं लगाते,बल्कि वापसी में सूद समेत वापस ले लेते हैं। इसका खर्च आम ग्राहक ही भुगतता है। इस तरह हम उसी के पैसे को उसे देकर वापस ले लेते हैं। इस काम में हमारी दुकान को विगत साठ सालों का अनुभव है। इसलिए टेंडर पाने के हम स्वाभाविक दावेदार हैं। इसके बाद तो हमसे आगे की दुकानों की भावी योजनाएं सुनने की हिम्मत नहीं बची और हम घर लौट आए।  


जनसंदेश टाइम्स में २५/०९/२०१३ को !
 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

जंगल में आया शेर !


 

देश में जंगल-राज की खबरें बहुत पहले से आ रही थीं,पर इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं थे।इधर कुछ लोगों के यह ऐलान करने के बाद कि जंगल में शेर आ गया है,जंगल-राज वाली बात पर मुहर लग गई है।इसके लिए सियार और लोमड़ी ने प्रचार-मंत्री का जिम्मा बखूबी संभाल लिया है।अब जब जंगल है तो शेर तो रहेगा ही और वही राज भी करेगा।इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि इस जंगल में शेर पैदा नहीं होते बल्कि बनाये जाते हैं।शेर के अलावा जंगल के सारे प्राणी निरीह होते हैं।उसकी धमक ही ऐसी होती है कि दूसरे पशु अपने जीवन-निर्वाह के बजाय अपनी जीवन-रक्षा में ही लगे रहते हैं।इस तरह जंगल में गजब की शांति रहती है।हाथी,तेंदुआ और बाघ उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं रखते,फ़िर हिरन,खरगोश और बन्दर किस खेत की मूली हैं ?जंगल की सत्ता इसीलिए शेर के अनुकूल रहती है।

हमारे देश में बाघों की गिनती में सब लगे रहते हैं पर शेरों की गिनती कोई नहीं करता।इसका सीधा मतलब यही है कि एक समय में एक ही शेर होता है,उसकी गिनती करने से वो नहीं बढ़ेगा।वअपने आप नहीं पैदा होता,उसे गाजे-बाजे के साथ जंगल में उतरना होता है।ऐसा नहीं है कि शेर अभी ही  आया है।इसके पहले वाला तो बब्बर शेर था,पर अब ज़्यादा बुजुर्ग हो गया है।उससे अब शिकार भी नहीं किया जाता।उसने अपने पंजों को उतरती खाल के साथ छुपा लिया है,इसलिए ऐसा शेर किस काम का ?यह वाला तो अच्छी नस्ल का है और गिर के वन से लाया गया है।यह ज़ोर से गरजता भी है और अपनी गुफ़ा में हड्डियाँ भी टाँगे रहता है जिससे कोई बाघ या तेंदुआ शेर बनने की कोशिश न करे।जंगल के बाकी पशु तो शेर की एक गर्जना पर ही लोटने लगते हैं,उन्हें किसी किस्म की घास डालने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

जब से नए शेर ने जंगल का काम-काज संभाला है,रोज़ नई दहाड़ सुनाई देती है।इससे कमजोर पशुओं को लगता है कि वह उन्हें भालुओं और पड़ोसी जंगल के हिंसक पशुओं से बचा लेगा।उन्हें यह शेर बहुत वैरायटी वाला लगता है।पुराने वाले शेर को कोई घास भी डालने को तैयार नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि घास खाने वाला शेर नहीं हो सकता।उधर भेड़िये और शिकारी कुत्ते शेर की आमद से थोड़ा हलकान हो गए हैं,आसमान में गिद्ध भी बेचैन हैं।ये सभी अब तक जंगल के पशुओं को नोचकर खा रहे थे और अपने भविष्य के प्रति निश्चिन्त थे। दूसरी ओर निरीह पशु सोच रहे हैं कि उनको तो हर हाल में नुचना ही है तो शेर का शिकार बनने में क्या हर्ज़ है ?
 
'जनवाणी' में १८/०९/२०१३ को

 

 

अपने करम जाँहिं अपकारी

कई दिनों बाद ककुआ कल शाम को दिखाई दिए।मैं पान की दुकान के पास खड़ा था कि अचानक उन पर नज़र पड़ी।वह बचकर निकलने ही वा...