रविवार, 29 मार्च 2015

गालियों में नैतिकता!

हमारी क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया से वापस आकर जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरी,कोहली ने डरते हुए इधर-उधर निगाह घुमाई।कहीं कोई नहीं था।उन्होंने रन-वे पर अपने साथ लाए एक बहुमूल्य और ऐतिहासिक रन की सुरक्षित लैंडिंग की और राहत की साँस ली।हालाँकि उन्हें ऑस्ट्रेलिया में ही खबर मिल गई थी कि देश में टमाटर फ़िर से मँहगे हो गए हैं फिर भी पत्थरों और जूतों पर उन्हें भरोसा नहीं था।वे तो कभी भी चल सकते थे पर एयरपोर्ट का शांत दृश्य देखकर उनकी जान में जान आई।

तभी उनकी नज़रें अखबार के पन्नों पर पड़ीं।हेडलाइन में ही ‘साले,कमीने’ देखकर वो थरथराने लगे।उन्होंने अन्य अख़बारों पर भी निगाह दौडाई पर सर्वत्र यही हाल था।अब तो उन्हें पसीना छूटने लगा।चरण ऐसे काँपने लगे जैसे वे पुनः ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर धर दिए गए हों।उन्हें घबराते देखकर रैना ने कोहली से पूछ ही लिया,’क्या सोशल मीडिया वाले यहाँ भी आ गए ?’ कोहली ने अख़बारों की ओर इशारा भर किया।रैना ने यह देखते ही कहा,’अरे भाई ! यह हमारे लिए नहीं है।अपना काम तो हमारे क्रांतिकारी जी ने कर दिया है।उन्होंने अपने एक ही वार से राजनीति ही नहीं खेल को भी बचा लिया है।जो उपाधियाँ तुम अपने लिए समझ रहे थे,वे उन्होंने अपने साथियों में ही बाँटी हैं,इसलिए हमको तुमको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।’

‘पर तुम्हें यह सब कैसे पता चला ? कोहली ने फ़िर भी आशंका जताते हुए पूछा।रैना ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया,’स्साले,तेरी होने वाली भाभी ने मुझे रात में ही मैसेज कर दिया था कि अब तुम लोग बेखटके अपने देश लौट सकते हो।मीडिया और सोशल मीडिया अब नए ‘कमीनेपन’ पर चर्चारत है।’

इतना सुनते ही कोहली ने रैना की पीठ पर एक जोरदार धौल जमाते हुए कहा,’ तू तो बड़ा कमीना निकला।इतनी बड़ी खबर अब तक मुझसे छुपाई।चलो अच्छा हुआ कि इस बार हमारी जान सस्ते में छूटी।पहले ही सोशल मीडिया ने हार का ठीकरा हमारी ‘जान’ के सर फोड़ दिया था।’

अभी तक इन दोनों की बातचीत सुन रहे धोनी से रहा नहीं गया।वे बोल पड़े,’तुम दोनों इस मामले को बहुत हल्के में ले रहे हो।नैतिक रूप से यह बहुत गलत हुआ है।अब हम अपनों को गाली भी नहीं दे सकते ?हम तो कहते हैं कि सबसे बड़ा कमीना तो ससुरा वो है,जिसने स्टिंग किया।ऐसा थोड़ी ना होता है कि मरीज ही डॉक्टर के इंजेक्शन भोंक दे !’

कप्तान की बात सुनकर दोनों सहम गए और नैतिकता की नई गालियों का मन ही मन पाठ करते हुए चुपचाप एयरपोर्ट से बाहर निकल आए।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

अब किसकी भैंस खुलेगी ?

अभी तक सरकार बहादुर ही हमसे अपने मन की बात करते थे और हम चाहकर भी अपनी बात नहीं कर पा रहे थे।अब माननीय न्यायालय ने कह दिया है कि सोशल मीडिया पर हम जमकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।इससे सब अपने मन की बात कह सकेंगे।सरकार के कुछ लोग इस कदम को लोकतंत्र के लिए उचित नहीं मानते।उनका मानना है कि इससे उनकी जो थोड़ी-बहुत पर्दादारी है,खुलकर बाहर आ जायेगी।लोग बेख़ौफ़ होकर लिखेंगे तो कुछ भी लिख डालेंगे।उनके भी बाल-बच्चे हैं और सारे कारनामे यदि सोशल मीडिया पर ऐसे ही आते रहे तो किसी दिन वे भी डिसलाइक का बटन दबा सकते हैं।इससे उनकी बड़ी थू-थू होगी।पर अपुन की सोच ज़रा हटके है.इससे निकट भविष्य में रोजगार की बड़ी सम्भावनाएं है.कुछ लोग सुपारी लेखन में भी सक्रिय हो जायेंगे.
कुछ समय पहले नवाब साहब की भैंसें खो गई थीं,तो राज्य का पूरा अमला उनकी सुरक्षा के प्रति चिंतित हो उठा था।जब तक उनका खूँटा बहाल नहीं हुआ,पूरी व्यवस्था तबेले में आ गई थी अब उनके या सरकार के खिलाफ लिखकर हम कौन-सी भैंस खोल लेंगे ?अगर खोल भी ली तो उनको ऐसी आपदाओं से निपटने का पूरा अनुभव है।सरकारें जब किसी दैवीय आपदा से नहीं घबरातीं,फ़िर कुछ निठल्ले लोग यदि सोशल मीडिया पर दो-चार कमेन्ट या दस-पाँच लाइक ठोंक भी देंगे तो क्या होगा ?खोई हुई भैंसें यदि पकड़ में आकर फ़िर से पगुराने लगती हैं तो ऐसे लोगों को सुधारने के लिए भी चारा डाल दिया जायेगा।बस,अब चारे का ही एक्स्ट्रा खर्च होगा।भैंस और सरकार तो अपनी जगह पर ही कायम रहेगी।
सोशल मीडिया पर लिखने को लेकर भी कुछ लोग चकराए हुए हैं।उन्हें लगता है कि उनके हाथ में लट्ठ पकड़ा दिया गया है कि वे चाहें जिस दिशा में उसे भांज सकते हैं।यह सरासर गलत है।एक धारा खत्म हुई है,पुलिसिया विचारधारा नहीं।कोई कितने ही लट्ठ घुमा ले,आखिरी लट्ठ उसी का बजेगा।व्यवस्था को बिगाड़ने का काम आम आदमी के हाथ में कभी नहीं आएगा।इसके लिए पहले से ही कई लोग जुटे हुए हैं।नए नियम से उनके इस पुश्तैनी धंधे पर किसी तरह की कोई आँच नहीं आई है।फ़िर भी अगर आप इंटरनेट की आज़ादी के नाम पर ज़श्न मनाना चाहते हैं तो मनाएं,हमारे पारंपरिक लोकतंत्र को इससे क्या फर्क पड़ने वाला !


मंगलवार, 24 मार्च 2015

तुम मन की बात सुनो !

तुम किसी भ्रम या भुलावे में न रहो।तुम्हारे असली हमदर्द हमीं हैं।हम ‘मन की बात’ करते हैं और वो तुम्हारे तन की।मन हमेशा अच्छा सोचता है।भूखे पेट होने पर तन भले ही अकड़ जाए पर लड्डू मन में ही फूटते हैं।इसलिए मन की सुनो।जो मन से सुखी है,उसको तन और धन की चिंता सताती भी नहीं।हम तो चाहते हैं कि तुम सब कुछ हमें सौंपकर चिंतामुक्त हो जाओ।यही हमारा संदेश है।एक-एक कर सबको समझा रहे हैं,धीरे-धीरे तुम भी समझ जाओगे।दूसरों के बहकावे में न आओ।हमने वर्षों पुरानी उनकी ज़मीन छीन ली है,इसलिए उनको तकलीफ हो रही है।थोड़े दिन बाद तुम्हारी तरह वो भी एडजस्ट कर लेंगे।

विरोधियों को आधार चाहिए,वे इसके लिए जूझ रहे हैं।हम तुम्हें भी ‘आधार’ देंगे पर उनकी लड़ाई में तुम मत जूझो।जल्द ही इससे तुम्हारी पहचान पुख्ता हो जाएगी।ज़मीन का क्या है,आज इसकी कल उसकी।ज़मीन रहेगी तो फ़सल की सुरक्षा हर समय खतरे में रहेगी।सूखा,बाढ़ या ओलावृष्टि होने पर तुम्हें फिर हमारी ही शरण में आना पड़ेगा।तो पहले ही क्यों न समर्पित हो जाओ ? तुम्हें वह सब सुख मिलेगा,जो इस सोंधी मिटटी ने तुम्हें नहीं दिया है।माटी-कचरे में डूबने के तुम्हारे दिन गए।देखो मैंने तुम्हारे लिए ‘मेक इन इंडिया’ से नया खिलौना बनवाया है।तुम इस घोड़े पर सवारी करो,पर लगाम हमारे हाथ में रहेगी।तुम अपनी बैलगाड़ी को हमारी बुलेट ट्रेन से रिप्लेस कर लो।यह रास्ते में बिना थके-ठिठके अपने गंतव्य तक पहुँचेगी।हाँ,बैलों की चारा-सानी के लिए जैसे नांद की ज़रूरत होती है,वैसे ही हमें तुम्हारी ज़मीन का रकबा चाहिए।हम इसमें तुम्हें मुँह मारने से तब तक नहीं रोकेंगे,जब तक तुम ‘मन की बात’ सुनते रहोगे।
हम अपने लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं।हमें तुम्हारे लिए सब करना है पर चूंकि तुम नादान हो,इसलिए तुम्हारा हित वही है,जो हम समझते हैं।तुम हल जोतना,बीज रोपना और खेत सींचने जैसे झंझटों से ऊपर उठ जाओ।सोशल मीडिया पर आओ और देखो,हमने कैसी दीवार खड़ी कर दी है।’विकास’ को अब खेत-खलिहानों में मत निहारो,यहाँ देखो।हमारे लाखों फ़ॉलोवर्स हैं,जो सोशल मीडिया को लगातार सींच रहे हैं।नई फसलें यहीं उगा करेंगी और यहाँ की बातों से ही तुम्हारा पेट भरेगा।इसलिए हल,कुदाल,खुरपी ज़मीन सब कुछ छोड़-छाड़कर हमारे पीछे आ जाओ,फ़ॉलोवर बन जाओ,खुश रहोगे।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...