रविवार, 26 जून 2022

बाढ़ और साहब का हवाई-दौरा

 देश के अधिकतर हिस्से गर्मी से तप रहे थे पर बड़े साहब का तप इससे भी तेज निकला।उनके हिस्से में बाढ़ आई हुई थी।वे बरामदे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।बाढ़ इतनी थी कि साहब के मुँह में पानी आ गया।सूखा भी तो बहुत दिनों से था।वे बेचैन हो उठे।जब भी उन्हें बेचैनी महसूस होती है,दौरे शुरू हो जाते हैं।इस बार भी यही हुआ।उन्होंने अपने क्षेत्र का दौरा फ़ाइनल कर दिया।साहब की तरह उनका व्यक्तिगत सचिव भी संवेदनशील था।दोनों से जनता के दुःख देखे नहीं जाते थे पर मन में जनसेवा का ऐसा ज्वार उठता था कि बिना देखे चैन नहीं आता था।सचिव जी तुरंत सक्रिय हो उठे।एक विशेष विमान से अपने और साहब के ‘दुःख-निवारण’ की व्यवस्था की।विमान अत्याधुनिक क़िस्म का था।उसकी खिड़कियाँ ‘दृश्य-फ़्रेंडली’ थीं।देखने वाले को वही दिखता था,जो वह देखना चाहे।कोई भी अवांछित-टाइप का दृश्य सामने नहीं पड़ता था।दौरे के समय इससे बाढ़ का पानी तो साफ़ दिखेगा,पर पानी में क्या-क्या समा गया है,यह नहीं।इसके लिए बाढ़-कमेटी है ना ! वही देख लेगी।उसको भी तो रोज़गार मुहैया कराना है।यह उनकी दूसरी बड़ी चिंता थी।


फ़िलहाल सचिव जी को साहब की चिंता थी और साहब को बाढ़ की।देखते ही देखते विमान हाज़िर हो गया।उसकी खिड़कियाँ ‘दृश्य-फ़्रेंडली’ के साथ-साथ ‘गंध-प्रूफ़’ भी थीं।दुर्गंध का एक भी झोंका साहब को विचलित कर सकता था।इससे बाढ़ से उपजे उनके दुःख में ख़लल पड़ने की आशंका थी।इसलिए ऐसा पुख़्ता इंतज़ाम किया गया था।इसी बात से उनकी संवेदनशीलता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।कहीं वे वाक़ई दुःखी हो गए तो फिर जनता का दुःख कौन बाँटेगा ? और हाँ,राहत भी तो बाँटनी है।यही सोचकर वे सचिव सहित विमान में समा गए।‘मेन-स्ट्रीम मीडिया’ से तीन छँटे हुए पत्रकार वहाँ पहले से जमे हुए थे।पहले भी वे सूखे और सरकार को बख़ूबी ‘कवर’ कर चुके थे।अब बाढ़ ‘कवर’ करने की ज़िम्मेदारी भी उनकी थी।साहब अपने सचिव की इसी तरह की दूरंदेशी के क़ायल थे।आज फिर हुए।


विमान उड़ने लगा।वे दोनों भी भरे मन से उड़े।साहब को रह-रहकर घर की याद आ रही थी,पर जनसेवा के आगे बेबस थे।मन ही मन सोचने लगे कि जब तक वे बाढ़ से हुए नुक़सान का जायज़ा नहीं ले लेते,राहत-परियोजना पर काम नहीं शुरू हो पाएगा।साहब को चिंतित देखकर सचिव जी साथ में बैठे पत्रकारों की ओर ताकने लगे।इनमें एक युवा पत्रकार ज़्यादा उत्साहित लग रहा था।उसे न्यूज़ ‘ब्रेक’ करने की जल्दी थी।विमान अभी बाढ़-क्षेत्र में आया भी नहीं था पर उसका सवाल आ गया।मुस्कुराते हुए उसने साहब से पहला सवाल किया, ‘इस बार की बाढ़ कितनी गंभीर है ? इससे निपटने के लिए आपके पास किस तरह की योजनाएँ हैं ?’


सवाल सुनते ही साहब खुद गंभीर हो गए। बोले-‘देखिए,यह वाली बाढ़ पहले से ज़्यादा तीव्र लग रही है।हमें और अधिक योजनाओं की ज़रूरत होगी।एक बात साफ़ है।सरकार इस काम में कोई कोताही नहीं बरतेगी।दौरा शुरू करने से पहले ही हमने बीस-सदस्यीय ‘बाढ़-राहत कमेटी’ गठित कर दी है।इस बार उसका बजट भी बढ़ा दिया है।कमेटी पूरी तरह संतुष्ट है।बाक़ी देखते हैं कि जान-माल का कितना नुक़सान हुआ है ?’ यह कहकर साहब ने राहत की साँस ली।


इस बीच सचिव जी ने ऐलान किया।हम बाढ़-ग्रस्त क्षेत्र के ऊपर से गुजर रहे हैं।बाक़ी सवाल इलाक़े के अवलोकन के बाद लिए जाएँगे।सबने आसमान से नीचे की ओर झाँका।हर तरफ़ जल ही जल दिख रहा था।खेत और ऊसर में कोई फ़र्क़ नहीं था।फ़सलें रोज़गार की तरह ग़ायब थीं।बीच में कहीं-कहीं लंबे पेड़ विपक्षी दलों की तरह अपनी सत्ता बचाए दिख रहे थे।जन और जानवर का कोई भी निशान नहीं दिखा।सचिव जी ने निष्कर्ष निकालते हुए घोषणा की, ‘लोगों में सहन-शक्ति की अत्यंत कमी है।हो न हो,जन और जानवर आपदा के समय मैदान छोड़कर भाग गए हों ! इससे हमें नुक़सान का हिसाब लगाने में और समय लग सकता है।’ साहब ने सहमति में सिर हिलाते हुए आश्वस्त किया कि जनकार्यों के निष्पादन के लिए समय की कोई कमी नहीं है।कमेटी को इसका भी अधिकार दे दिया गया है कि वह अगली बाढ़ से पहले इसका सही-सही आकलन कर ले।

लगभग आधे घंटे के सघन दौरे के बाद विमान विशेष हवाई पट्टी पर उतर गया।यहाँ गेस्ट-हाउस में भोजन और विश्राम का कार्यक्रम था।वरिष्ठ पत्रकार ,जो एक बड़े चैनल से थे, बड़ी देर से कसमसा रहे थे।भोजन के बीच में एक महत्वपूर्ण सवाल पूछ बैठे, ‘इतने व्यस्त कार्यक्रम के बीच आप कभी थकते नहीं ? हमारे श्रोता जानना चाहेंगे कि आपकी इस सक्रियता का राज क्या है ?’


साहब ने डकार लेते हुए उत्तर दिया, ‘सच बताऊँ,हमें राहत बाँटने से ही राहत मिलती है।यदि आपदाएँ आना बंद हो जाएँ,लोगों का भला करने को हम तरस जाएँ।ईश्वर उनकी भी सुनता है और हमारी भी।जब भी कोई आपदा आती है,पूरी मशीनरी सक्रिय हो उठती है।इसलिए हर आपदा हमें अवसर देती है।आप स्वयं इसके गवाह हैं।तीसरा पत्रकार जो अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था,यह सुनकर उसने पानी का गिलास उठा लिया।


अचानक मौसम की बातें होने लगीं।सबने राहत की साँस ली।


संतोष त्रिवेदी

रविवार, 8 मई 2022

साहित्यिक चोरी का कलापक्ष

कल शाम लेखक-मित्र का फ़ोन आया।बड़े आहत थे।कहने लगे,उनके साथ बड़ी नाइंसाफ़ी हुई है।उनकी एक ‘हिट-रचना’ सोशल मीडिया से चोरी हो गई।दो दिन पहले ही उन्होंने उसे वहाँ लगाया था।ख़ूब वाहवाही भी बटोरी थी,पर कुछ लोगों ने उसे अपने नाम से कई जगह बाँट दिया।इस बात की खबर भी उन्हें दूसरों से मिली।उनके लिए यह बहुत बड़ा साहित्यिक-आघात है।उनके दुःख की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता क्योंकि मेरी कभी कोई रचना चोरी नहीं हुई।सच तो यह कि लिखने के बाद मुझसे ही नहीं पढ़ी गई तो दूसरे क्या पढ़ते !


ख़ैर,अभी उनकी बात चल रही है तो उन्हीं पर फ़ोकस करते हैं।उनको इतना आहत जानकर मुझे थोड़ा अचरज हुआ।सोचने लगा,ऐसे समय में जब समाज से सद्भाव, देश से लगाव और बड़े गोदामों से निठल्ले नींबू चोरी हो रहे हैं, उन्हें अपनी रचना की पड़ी है, पर नहीं कहा।और भी आहत हो सकते थे।इसलिए मैंने फ़ौरी सांत्वना दी, ‘भई, चोरी होने के ख़तरे हैं तो फ़ायदे भी।फ़िलहाल आप केवल फ़ायदे गिनें।चोरी होकर ही आपकी रचना वायरल हो पाई,वर्ना इसका शायद ही कोई ज़िक्र करता।अब सब जगह इसका प्रसार हो रहा है।मतलब वायरल होने के लिए चोरी होना ज़रूरी है।इसलिए तुम इसका केवल उजला पक्ष देखो।अब तुम प्रेमचंद और परसाई की क़तार में शामिल हो गए हो।जगह-जगह छपकर और कई संस्करणों में बिककर जो उपलब्धि नहीं हासिल कर पाए,वह इस इकलौती रचना ने चोरी होकर दिला दी।यह बड़ी बात है।’ मेरी दो-टूक सुनकर वे और टूट गए।कहने लगे,‘यार, कभी तो सीरियस हुआ करो।मेरी तो नींद उड़ी हुई है।जिन लोगों ने रचना को अपने नाम से लगाया है,लोग उन्हें ही असली रचनाकार मान रहे हैं।मेरी दिक़्क़त अलग क़िस्म की है।एक तो मैं लिखता नहीं।लिखता हूँ तो कोई छापने को तैयार नहीं होता।कहते हैं,सब आपकी तरह बेरोज़गारी नहीं निभा सकते।ले-दे के सोशल मीडिया बचा था,यहाँ भी चोरों ने क़ब्ज़ा कर रखा है….’

  

उनको बीच में ही टोकते हुए मैंने कहा,‘देखिए ,जिन्हें तुम चोर कह रहे हो,तुम्हारी रचनाओं के सजग पाठक और असली प्रशंसक वही हैं।पूरे मनोयोग से पढ़ने के बाद ही वे उन्हें चुराने के क़ाबिल समझते हैं।अपनी ओर से कोई हेरफेर न करके पूरी रचना को मौलिक रूप में आगे बढ़ा देते हैं,बस।इसे तुम ‘चुराना’ कहकर उनकी प्रतिभा का अपमान कर रहे हो।कम से कम वे आज के आलोचकों की तरह नहीं हैं जो एक तरफ़ तो अपने मित्रों की रचनाओं को बिना पढ़े सिर पर चढ़ा लेते हैं, वहीं अमित्र लेखक की रचना को ललाट पर चश्मा चढ़ाकर उसका ‘क्लास’ देखते हैं और एकदम से ख़ारिज कर देते हैं।इससे तो ये ‘चोट्टे’ कहीं अधिक ईमानदार हैं।’


‘फिर भी इस चौर्यकर्म को मैं भुला नहीं सकता।मेरा नाम मिट्टी में मिल जाता तो भी मैं संतोष कर लेता,पर इस कृत्य से तो सोशल-मीडिया में मिल गया हूँ।आने वाले सभी सम्मान यही चोट्टे हथिया सकते हैं।यह अन्याय मेरे साथ नहीं पूरी साहित्यिक-बिरादरी के साथ हुआ है।इससे मोर्चा लेने की ज़रूरत है,न कि आँख मूँद लेने की।जब हम अपने धर्म को बचाने के लिए ‘शोभायात्रा’ और जुलूस तथा देशभक्ति साबित करने के लिए ‘तिरंगा-यात्रा’ निकाल रहे हैं, फिर मेरी रचना के लिए भी ‘मौलिक यात्रा’ क्यों नहीं ! इस पर साहित्य-जगत मौन क्यों है ? यह सभी रचनाकर्मियों का धर्म है।’ इतना कहकर उन्होंने ठंडी साँस भरी।


उनके मुँह से धर्म का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए।वे साहित्य में धर्म घुसेड़ने पर आमादा थे।पहले ही राजनीति में घुसकर धर्म ने सबका कल्याण कर दिया है,अभी भी उनको उससे आस है।धर्म के प्रति उनके प्रेम को देखकर मेरे मन में ‘निम्न’ विचार आने लगे।‘लोगों के दिलों से भक्ति,इबादत कब चोरी हो गई पता ही नहीं चला।ईश्वर पूरी तरह नारे में बदल गया है।लोग इतने आस्थावान हो गए हैं कि दूसरों के घरों में घुसकर प्रार्थनाएँ बाँच रहे हैं।’मैंने उनसे यह सब नहीं कहा बल्कि उनके संघर्ष वाले जज़्बे की सराहना की।उन्होंने भी साहित्यिक-चोरों को देख लेने की बात कहकर फ़ोन काट दिया।


उनके इस दुःख से मुझे आत्मीय सुख मिला।मैं मन ही मन ख़ुश था,पर संवाद के दौरान प्रकट नहीं होने दिया।लिखते-पढ़ते इतनी कुशलता तो आ ही गई है।इस ‘साहित्यिक-चोरकटई’ को झाँकने के लिए मैंने सोशल मीडिया में प्रवेश किया।सभी चोर अपनी बात पर अड़े थे।एक युवा चोर ने ज्ञान दिया कि लिखने के बाद रचना लेखक की नहीं रह जाती।साहित्य और राजनीति में विज्ञान की तरह का कोई पेटेंट नहीं होता।हर कोई अपनी कलात्मकता दिखा सकता है।एक वरिष्ठ चोर ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके कविता के तीन संग्रह इसी प्रतिभा की उपज हैं।अगर इस तरह इस कला पर प्रतिबंध लगाया गया तो साहित्य भी नीरस होकर रह जाएगा।हम जैसे लोग ही साहित्य का सही प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।आज का पाठक भी विवादित साहित्य को पहले लपकता है।इसलिए इस कला को संरक्षण की ज़रूरत है।उनके इन तर्कों का सभी संभावित चोरों ने समर्थन किया।मैं बिना कुछ कहे ‘ट्विटर’ में कूद पड़ा।यहाँ लेखक-मित्र की रचना को एक अनुभवी चोर ने अपने नाम से पोस्ट कर रखा था।मैंने उस पर कमेंट किया,‘साहित्यिक चोरी अच्छी बात नहीं।’ उसने इसे भी तुरंत रिट्वीट कर दिया।


संतोष त्रिवेदी 

रविवार, 27 मार्च 2022

मूर्ख होने का मुग़ालता

बचपन में पढ़ा था कि आदमी पढ़-लिखकर बुद्धिमान बन जाता है जबकि बिना पढ़ा-लिखा आदमी निरा मूर्ख रहता है।पर अब जाकर पता चला कि यह सब किताबी बातें हैं।ख़ूब पढ़-लिखकर भी आदमी अच्छी क्वॉलिटी का मूर्ख बन सकता है।पढ़ने से मूर्खता और प्रतिभाशाली हो उठती है।जहाँ बुद्धिमान होना काग़ज़ी और ‘फ़ेक’ है वहीं मूर्ख होना सहज और ‘रियल’ है।मेरे कई मित्र पैदाइशी बुद्धिमान हैं।पढ़-लिखकर वे सब बुद्धिजीवी बन चुके हैं।अच्छी बात यह कि वे मुझे भी अपने जैसा ही समझते हैं।दरअसल,यह उनकी गलती नहीं है।मैंने खुद को ऐसा तैयार किया है कि बाहर से बुद्धिमान लगूँ।कई बार तो मुझे भी शंका होने लगती है कि मैं भी उन जैसा हूँ।फिर अगले पल मेरी उपलब्धियाँ बताती हैं कि मैं दिशाहीन होने से बच गया।बिना किसी मुलम्मे के मैं सोने-सा ख़रा मूर्ख हूँ।मुझे इस बात का बेहद संतोष है कि मूर्खता के दम पर मैंने अपनी अलग पहचान बनाई है।आज बुद्धिमान झख मार रहे हैं और हम जैसे मूर्ख इतिहास लिख रहे हैं।


बुद्धिमान होने के जहाँ ढेर सारे संकट हैं,मूर्ख होते ही वही सब अवसर में बदल जाते हैं।मुझे बुद्धिमान होना कभी सहज नहीं लगा।चेहरे से लेकर काम-काज तक में इसका असर दिखाई देता है।बुद्धिमान दिखने के लिए मनहूसियत की हद तक गंभीर होना होता है,जबकि मूर्ख हमेशा खिला-खिला और ‘ओपन’ होता है।वह जल्दी खुल जाता है जबकि बुद्धिमान नामक जीव कई मुलाक़ातों में भी नहीं खुलता।बेहद गोपन होता है।मूर्खता मौलिक हो तो आदमी बिलकुल सहज रहता है।उसमें कोई बनावट या मिलावट नहीं होती।विद्वान इसीलिए उसे ‘जड़’ कहते हैं।वह हर हाल में स्थिर होता है।झूठ-मूठ की विद्वता ओढ़ना,स्वाँग करना और दूसरों को भ्रमित करना बुद्धिमानों के साधारण कृत्य हैं।मूर्ख जो करते हैं,उल्लेखनीय करते हैं।इसीलिए मूर्खता मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है।इसका अपना आत्म-विश्वास होता है।मूर्ख बात-बात पर गर्व की अनुभूति करता है जबकि बुद्धिमान इतना दीन होता है कि वह किसी बात के लिए गर्व भी नहीं कर सकता।


मैं जितने बुद्धिमानों को जानता हूँ,सब परेशान रहते हैं।कभी स्वयं के लिए,कभी समाज के लिए,कभी देश के लिए।कभी-कभी तो वे किसी ‘फ़िल्म’ के लिए भी बेचैन हो उठते हैं।असल में किसी ने उन्हें बता दिया है कि बेचैन रहना ही बुद्धिमान बने रहना है।उनकी इस बेचैनी का खमियाजा कभी कविता भरती है,कभी कहानी।जब ज़्यादा बेचैन होते हैं तो उपन्यास पूरा होने से पहले नहीं रुकते।यह बेचैनी भी वे सोशल-मीडिया में बताकर ख़त्म करते हैं।इससे प्रकाशक बेचैन हो उठता है कि अब उसे उनकी इस ‘बेचैनी’ का सदुपयोग करना पड़ेगा।यह तो ऐसे बुद्धिमानों की व्यथा है जो साहित्य में घुसकर अपनी बेचैनी दूर कर लेते हैं।एक फ़िल्म के लिए जब यह बेचैनी मचती है तो करोड़ों का बिज़नेस कर डालती है।इसे करने के लिए अव्वल दर्जे की बुद्धिमत्ता की ज़रूरत होती है।कुछ दूसरे बुद्धिमान हैं,जो मँहगाई और अराजकता पर सरकार के ख़िलाफ़ ‘चैनल’ खोल देते हैं।देश-दुनिया में कोई मरे,ये हरदम ‘लाइव’ रहते हैं।ऐसे ‘मिलिनेयर यू-ट्यूबर’ थोड़ी-थोड़ी देर में बेचैन हो उठते हैं।सरकार भी उनकी इस बेचैनी को ख़ूब हवा देती है।पब्लिक की बेचैनी इससे काफ़ी कम हो जाती है।इस तरह साहित्य हो या राजनीति,सब जगह बेचैनी ‘कैश’ होती है।


मूर्ख होने पर ऐसा कुछ भी ‘फ़ील’ नहीं होता।वह दूसरों की चिंता में अपना सुख बर्बाद नहीं करता।दूसरे के दुःख में भी वह अपने हिस्से का सुख खींच लेता है।बुद्धिमान बनना मुझे शुरू से इसलिए भी पसंद नहीं रहा क्योंकि उसका समानार्थी शब्द ‘अक़्लमंद’ होता है।जिसकी अक़्ल ही मंद हो,वह किस गति को प्राप्त होगा,आप आसानी से समझ सकते हैं।इतने अक़्लमंद तो आप भी होंगे !


मूर्ख मूलतः तीन प्रकार के पाए जाते हैं।निम्न कोटि वाले ‘शठ’ कहाते हैं।ऐसे लोग ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाते।‘सत्संगति’ पाकर एकदम से विचलित हो उठते हैं।इनकी मूर्खता पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता।इसके बाद मध्य कोटि वाले ‘लंठ’ होते हैं।इनको विधाता तक नहीं सुधार सकते।सरकार भी सुधारने का प्रयास नहीं करती।इन दोनों के बारे में तुलसी बाबा थोड़ा संकेत दे गए हैं।इधर तेज़ी से नया ‘वेरियंट’ विकसित हुआ है।यह उच्च कोटि की प्रजाति है ,जिसे ‘बज्रमूर्ख’ कहते हैं।इसे अक़्सर सोशल मीडिया में पाया जाता है।यह किसी की नहीं सुनता।केवल अपनी सुनाता है।सत्य और तथ्य से इसे रत्ती भर मतलब नहीं होता।यहाँ तक कि इसके पास सत्य को भी असत्य सिद्ध कर देने की मौलिक मूर्खता होती है।आधुनिक काल की यह नई उपलब्धि है।इसे ईश्वर और सरकार दोनों की कृपा समान रूप से मिलती है।मेरा अंतिम लक्ष्य यही उत्तम कोटि की मूर्खता है।पूरे मनोयोग से मैं इस पर लगा हूँ।अब यही देखिए ! रात का अंतिम प्रहर है।घर के बाक़ी सदस्य बुद्धि बेचकर सो रहे हैं और मैं उसी बुद्धि से मूर्खता पर गंभीर शोध कर रहा हूँ।संपूर्ण जगत के लिए साहित्य रच रहा हूँ।अब आप खुद तय कीजिए कि मेरी तपस्या में क्या कमी है !



संतोष त्रिवेदी


संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...