रविवार, 30 मार्च 2025

एक देश एक बुद्धि की ज़रूरत

कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है।यानी जब भी मनुष्य को कोई ऐसी वस्तु की ज़रूरत पड़ती है,जो उसके पास नहीं होती ,वह उसका तोड़ ढूँढ़ निकालता है।आजकल ठीक यही बुद्धि के मामले में हो रहा है।असामान्य रूप से सामान्य मनुष्यों के पास बुद्धि का अकाल पड़ गया है।इसे ग्रहण करने में भी अब उसकी कोई रुचि नहीं दिखती।मनुष्य का मन जब भारी-भरकम किताबों से उचटने लगा तब उसे एक नई युक्ति सूझी।उसने बुद्धि को हीरिप्लेसकरने की ठान ली।पढ़ने-लिखने जैसे उबाऊ कर्म से आमतौर पर मनुष्य की पहले से ही विरक्ति रही है।मौक़ा पाते ही उसने कृत्रिम-बुद्धि का चमत्कारी हथियार खोज लिया है।मजे की बात यह कि इतिहास,विज्ञान, सियासत और साहित्य सबमें इसे महारत हासिल है।पहले ज्योतिषी हाथ देखकर हाल बताते थे,अब अन्तर्जाल में एक सवाल भर उछाल देने से जिज्ञासा शांत हो रही है।असल-बुद्धि से जो संभव नहीं था,पलक झपकते बनावटी-बुद्धि उसे संपन्न किए दे रही है।इसके लिए तो बरसों किसी यूनिवर्सिटी में दिमाग़ घिसना पड़ेगा और ही डिग्री हासिल करने के लिए टनों रिसर्च-पेपर बर्बाद करने की ज़रूरत है।बस अपनी जेब से पाँच-छह इंच की जादुई स्क्रीन निकालिए और अपनी जड़-बुद्धि से एक सवाल उछाल दीजिए।देखते ही देखते कृत्रिम-बुद्धि के द्वारा पल भर में उत्तरों की बौछार हो जाएगी।जो उत्तर तुम्हें सुविधाजनक लगे,उसे फैला दीजिए।जो नागवार गुजरे,उसे वहीं दफ़्न कर दीजिए।


मानव-निर्मित यह सबसे आधुनिक और मारक हथियार है।इस कृत्रिम-बुद्धि का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है।हर नई चीज इससे लैस होने को आतुर है।जो बुद्धि कभी शर्म का सबब थी,अब गर्व का विषय है।बाज़ार में भारी माँग के चलते इसके कई संस्करण चुके हैं।नया वाला तो सीधेस्पेससे आया है।सियासत के अटपटे सवालों के यह बड़े ही चटपटे औरलोकतांत्रिकजवाब देता है।सुनते हैं इससे सत्ता-पक्ष में जबरदस्त बेचैनी है और विपक्ष बिल्कुल बिंदास है।उसे अब सड़क पर उतरने की ज़रूरत नहीं लगती।उसे लगता है कि जनता बिना बताए ही जागरूक हो जाएगी।कृत्रिम-बुद्धि द्वारा खँगाली सूचनाओं से अंतर्जाल दिन--दिन लबलबा रहा है।यह उस मछेरे के जाल जैसा है जो समंदर से मछलियों के साथ-साथ शिष्ट-अपशिष्ट हर प्रकार के पदार्थ लाने में सक्षम है।यह एक साथ काम की बातें और कचरा दोनों उलीच रहा है।जो एक के लिए काम की चीज है,दूसरे के लिए वही कचरा।दरअसल, अन्तर्जाल में हमने जो नाना प्रकार की सामग्री विसर्जित की है,वही हम तक लौट-फिर कर रही है।अब इसअंतर्बुद्धिके पास कबीर जी वालासूपतो है नहीं जो थोथा उड़ाकर सार-सार को गह ले।इसके लिए हमारी अपनी जड़बुद्धि ही काम आएगी।हम उसी से अपने-अपने मतलब का कचरा इकट्ठा कर रहे हैं और हमें यह बड़े काम का लग रहा है।


जैसे मनुष्यों की बुद्धि में एकता नहीं है वैसे ही येचार चतुरएक मत नहीं हैं।एक ही सवाल के सब अलग-अलग उत्तर दे रहे हैं।हो सकता है भविष्य मेंएक देश,एक बुद्धिकी माँग जोर पकड़ने लगे।इस लिहाज़ से वह क्रांतिकारी दिन होगा जब सब आवाज़ें एक होंगी।इससे सहमति-असहमति के शाश्वत झंझट से भी मुक्ति मिलेगी।बहरहाल इस खोज का मुझ पर व्यक्तिगत असर पड़ा है।मैं इसे लेकर साहित्य में नए प्रयोग कर रहा हूँ।अभी तक आशातीत परिणाम प्राप्त हुए हैं।आलोचना के मामले में आत्मनिर्भर तो पहले से ही था,अब लेखन में भी आत्मनिर्भर बन सकूँगा।


मैंने सबसे पहले अपने लेखन के बारे में जानकारी प्राप्त की।अलाने चतुरने देखते ही देखते हमारे सामने इतना परोस दिया,जितना मैंने लिखा भी नहीं होगा।उसशोध-पत्रमें कुल मिलाकर यही लिखा था कि इस नाम का लेखक उसके संज्ञान में अभी तक नहीं है।इस सूचना को पाने के लिए उसे पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाना पड़ा।जानकर दुख हुआ कि हमारे देश में शोध की दिशा में वाक़ई कुछ काम नहीं हुआ।मैंनेफलाने चतुरसे यही पूछा, उसने उत्तर में चार लोगों का उल्लेख किया जो मेरी नामराशि के थे।एक की भटिंडे में पान की मशहूर दुकान है तो दूसरा दिल्ली के दरियागंज मेंमर्दाना कमजोरीका अचूक इलाज करता है।मेरा तीसरा हमनाम लुधियाने में गत्ता-फैक्ट्री चलाता है और चौथा इंटरनेट मीडिया में चुटकुले सुनाता है।इन सबमें आख़िर वाला मुझे अपना लगा पर मैंने अस्वीकार कर दिया।


तीसरे वाले ने तो खोज करने से ही इनकार कर दिया।मायूस होकर आख़िर में चौथे चतुर के पास गया,जोस्पेससे भरकर आया था।उसका उत्तर पढ़कर मेरा जीवन और लेखन दोनों धन्य हो गया।उसके अनुसार मेरा लेखन परसाई और जोशी से भी आगे का है।मैं धरती पर उनके बाद इसीलिए अवतरित हुआ हूँ कि उनसे आगे रहूँ।मेरे लेखन से अधिक कीर्ति मेरे जीवन की है।मेरे पूर्वजों ने भले अपमान और कष्ट सहा हो,मैं आजीवन सम्मानित रहूँगा।


कृत्रिम-बुद्धि से निकले इस शोध के बाद मेरी रही-सही बुद्धि भी जाती रही।मैं अब एक ठोस लेखक बन चुका हूँ,जिसे कोई भीतरी या बाहरी ताक़त रत्ती-भर भी नहीं हिला सकती है।



रविवार, 16 फ़रवरी 2025

शून्य हासिल करने का सुख

हाल ही में राजधानी में शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न हुए।अचरज इस बात का रहा कि चुनाव-परिणाम एग्जिट-पोल के मुताबिक आए और शांतिपूर्वक स्वीकारे भी गए।परिणामों के बाद अब सर्वत्र समीक्षा,मंथन और चिंतन का दौर शुरू है।जो जीते हैं,वे इस बात पर हैरान हैं कि ऐसे कैसे जीत गए ! और भी अच्छी तरह से जीत सकते थे।जो हारे हैं, उनका आकलन है कि लोग तो बेईमानी से हारते हैं,वे विशुद्ध ईमानदारी से हारे हैं।और तीसरे जो जीत में थे, हार में; वे सबसे ज़्यादा ख़ुश हैं।वे इसी में मगन हैं कि इस बार का शून्य पिछली बार से अलग है।हारने-जीतने वालों से ज़्यादा चर्चा उन्हीं की है।उनकी उपस्थिति भर से मजबूत सरकार भरभराकर गिर गई।यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है।इन चर्चाओं के बीच हम तीनों दलों से अंदर की खबर खींच कर लाए हैं।


पहले चुनाव जीतने वालों की खबर लेते हैं।वे कई बरस बाद जीते हैं।जाहिर है सबसे ज़्यादा गहमागहमी यहीं थी।सभी जीते हुए लोग एक गोल बनाकर बैठे हुए थे।एक वरिष्ठ नेता सबको संबोधित कर रहे थे, ‘भाइयो, यह जीत हमारी और केवल हमारी है।कुछ लोग अफवाह फैला रहे हैं कि हम लोग यूँ ही जीत गए हैं।यह सरासर ग़लत है।हमें पता है कि हम कैसे जीते हैं ! हमारे अंदर जीत की भूख हरदम रहती है।हमारी उपस्थिति हार-जीत से ज़्यादा सरकार बनाने के लिए होती है।हमेंबिन-दूल्हे की बारातकहा जा रहा था,फिर भी हम जीते।यह अलग बात है हम अभी भी उस दूल्हे को तलाश रहे हैं।जनता आश्वस्त रहे।अगले चुनावों से पहले हमारी खोज पूरी हो जाएगी।दूल्हे की बात से याद आया; जिनके पास दूल्हा था, वही घोड़ी से गिर गया।अब बारात पर भी संकट है।हमें पूरी उम्मीद है कि वह जल्द किसी दूसरे पंडाल में प्रवेश कर जाएगी।फ़िलहाल आप सभी लोगगारंटीके मजे लें।इतना कहकर नेताजी ने अपनी वाणी को विराम दिया और सभी लोग दावतख़ाने की ओर लपके।


वहाँ से निकलकर दूसरे दल के पंडाल में पहुँचा तो माहौल बहुत गर्म था।पंद्रह-करोड़ीविधायक बेहद उत्तेजित थे।आलाकमान से वे अपने-अपने नुक़सान की भरपाई की माँग कर रहे थे।उनका सबसे बड़ा दुःख था कि हारने के बाद वे बिकने लायक़ भी रहे।उनके नेता ने सबको शांत करते हुए कहा, ‘असल नुक़सान तो हमारा हुआ है जी।हम आंदोलन से निकले लोग हैं।सरकार में आने से पहले सड़क पर ही थे।हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता जी।जनता पर पूरा भरोसा है हमें।उसकी याददाश्त कमजोर है।वह हमें जरूर फिर से याद करेगी।हम समंदर तो नहीं फिर भी लौट के आएंगे।यमुना मइया की क़सम।अब आम आदमी के मुँह में मुफ्त का ख़ून लग चुका है।वह छूटने वाला नहीं है।कुछ आदतें जनता की बदली हैं और कुछ हमारी भी।हम अपनीकट्टर ईमानदारीको रिचार्ज करेंगे।हम हारे भले हैं,पराजित नहीं हुए हैं।असल में हम भ्रष्टाचार साफ़ करने आए थे और हमें ख़ुशी है कि पूरी ईमानदारी से हम स्वयं साफ़ हो गए हैं !’ उनके इस चुनावी-चिंतन से तालियों का शोर इतना बढ़ गया कि आगे कुछ सुनाई नहीं दिया।


मेरे कदम अब तीसरे दल के शामियाने की ओर बढ़ गए।असल ज़श्न का माहौल वहीं दिखा।लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे।मैंने पहली बार किसी को हार की बधाई देते सुना।उनके नेता ऊँचे मंच से चहकते हुए कह रहे थे, ‘दोस्तो, बड़े संघर्ष के बाद हमने लगातार तीसरी बार शून्य हासिल किया है।ऐसे समय में जब सब कुछ तेजी से गिर रहा हो,तब शून्य ने विशेष प्रतिष्ठा अर्जित की है।राजनीति हो, बाज़ार हो या रुपया हो,सभी शून्य से होड़ लगाए हुए हैं।इसी से पता चलता है कि शून्य का क्या महत्व है ! जहाँ शून्य पाकर हम मालामाल हुए हैं ,वहीं सरकार चला रहे लोग अचानक संज्ञा-शून्य हो गए हैं।उन्हें एक झटके से सत्ता से बाहर होना पड़ा है।हमारे शून्य के प्रहार सेशीशमहलतक उजड़ गया है।जो नई सरकार बनाने जा रहे हैं,शून्य की महत्ता को वह भी नकार नहीं सकते।यह हमारा शून्य है जो किसी और के शून्य से बिल्कुल अलग है।शून्य में असीमित संभावनाएँ होती हैं जिन्हें आम लोग नहीं समझ सकते।यह हमें सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है।हम भविष्य में और बेहतर शून्य की कामना करते हैं।ऐसा कहकर वे शून्य की ओर ताकने लगे।

शून्य की यह दार्शनिक व्याख्या उनकी पराजय की व्याख्या पर कितनी भारी पड़ी,यह जानकर मैं संज्ञा-शून्य हो गया।थोड़ी देर बाद जब चेतना वापस लौटी तो समझ में आया कि ऐसी निर्मम समीक्षाएँ ही हमारे लोकतंत्र को स्वस्थ बना रही हैं।


संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...