सोमवार, 24 मार्च 2014

खेल, पर्व और महाकुम्भ!



चुनाव का ओलम्पिक अपने चरम पर है।इसमें प्रतियोगिता तो एक ही है दौड़ की,पर प्रतिभागी अनगिनत हैं।चुनावी आयोजन की भव्यता ओलम्पिक से भी अधिक दर्शनीय है।सबसे अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें दौड़ने के लिए नियमों की वैसी बंदिश या डोपिंग टेस्ट जैसा कुछ नहीं है,जैसा कि ओलम्पिक में होता है।प्रतिभागी अपनी-अपनी लाइनें तोड़कर ’क्रॉस कंट्री’ की तरह ‘क्रॉस पार्टी’ दौड़ में भाग ले रहे हैं।अनुभवी और चतुर खिलाड़ी दौड़ के बीच से ही अपनी लेन बदल रहे हैं।यही ‘लेन-देन’ परम्परा के वास्तविक ध्वज-वाहक हैं।’बहुत ही क्रान्तिकारी’ आयोजन लग रहा है यह।लगता है ,इसके बाद वैसा कुछ नहीं होगा,जैसा अभी तक हो रहा था।

इस चुनावी खेल में दागी,बागी के अलावा ‘भागी’ टाइप प्रतिभागी भी शामिल हो गए हैं।वे हरी झंडी दिखाने के बाद उलटी दिशा में भाग रहे हैं ।कोई अस्वस्थ है तो किसी को संगठन की सेवा करनी है।टिकट का मोह न करने वाले ऐसे अप्रतिम योद्धा दुर्लभ हैं।इस चुनाव में जितनों को टिकट बँटे हैं,उससे कहीं अधिक के कटे हैं।कई तो अपना परिणाम निश्चित मानकर भी उत्सर्ग के लिए उद्यत हैं।इनकी कथा संगठन और पार्टी के ऐतिहासिक दस्तावेजों में शुमार की जायेगी।अमूमन कोई पार्टी या संगठन कमजोरों और असहायों के काम आती है,पर वे बिरले ही हैं जो पार्टी के गाढ़े वक़्त में काम आते हैं।ऐसे शूरवीरों को सत्ता मिलने पर ‘पार्टी-रत्न’,’पार्टी-भूषण’ आदि उपाधियों से अलंकृत किया जा सकता है,जिससे उन बेचारों का पुनर्वास किया जा सके।

चुनावों को लोकतंत्र का पर्व भी कहा गया है इसलिए ‘परब-त्यौहार’ में कोई नाराज़ न हो,इसका खास खयाल रखा जाता है।ऐसे मौके पर घर के बड़े-बूढ़े भले रूठ जाएँ पर बाहर से अपनी शरण में आए हुओं को प्राथमिकता देना भारत की प्राचीन संस्कृति रही है।तुलसीदास बाबा ने बहुत पहले ही कलियुग में ऐसी स्थितियों को भाँपकर लिख दिया था,'शरणागत कहुं जे तजहिं,निज अनहित अनुमानि।ते नर पांवर,पापमय,तिन्हहि बिलोकत हानि।’ इसलिए ‘रोजी-रोटी रहित’ होने की आशंका से जो मनुष्य कहीं आते हैं,वे संसार के सबसे निरीह प्राणी होते हैं।ऐसे में उनको नकार देना न्याय और धर्म दोनों के विरुद्ध है।इन लोगों को जीतने वाली चुनावी-टिकट से गज़ब की संजीवनी मिलती है।इनकी मजबूरी है कि ये इसके बिना जीवित नहीं रह सकते।हर्ष की बात है कि इसका दायित्व सत्ता के सबसे बड़े दावेदार,संस्कृति रक्षा दल वाले बखूबी निभा रहे हैं ।

इन चुनावों को कुछ विशेषज्ञ महाकुम्भ की भी संज्ञा देते हैं।जिस प्रकार महाकुम्भ हर बारह वर्ष बाद आता है,उसी प्रकार पाँच वर्ष बाद आम चुनाव।भारतीय जनता को विश्वास है कि पिछला जितना भी किया-धरा हो,अच्छा हो,बुरा हो;कुम्भ में डुबकी लगाने से सब धुल जाता है।ठीक वैसे ही भारतीय नेताओं को लगता है कि कैसी भी चटख कालिख हो,कोयला हो;चुनावी-पर्व में हवा हो जाता है।उनके इस विश्वास का आधार यही है कि चुनाव आते-आते मंहगाई एवं भ्रष्टाचार के जलाशय सूख जाते हैं और जनता धर्म तथा जाति के कूप में डुबकी लगाने लगती है।इस लिहाज़ से आम चुनाव खेल भी है,पर्व भी है और सब दागों,पापों का शमन करने वाला महाकुम्भ भी।

जनसंदेश में 24/03/2014 को।


शनिवार, 15 मार्च 2014

सुराज आ रहा है,कुछ तो गड़बड़ है !



देश भर में इस समय लोकतंत्र की बयार चल रही है।चुनाव को लोकतंत्र का पर्व माना जाता है पर मीडिया इसे रणक्षेत्र,रणभेरी,कुरुक्षेत्र और महाभारत बता रहा है।जनता इस बीच भारी कन्फ्यूज़न में है,कुछ तो गड़बड़ है।नेताओं के मुँह से प्यार के सोते और झरने तथा दिल में टिकट के लड्डू फूट रहे हैं।इमरजेंसी के बहुत दिनों बाद कोई नेता ‘मीसा’ का शिकार हुआ और वह जेल के बजाय कमल की शोभा बढ़ा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।साहब की लहर चल रही है पर नाव भँवर में डगमगा रही है।नाविक मझधार में सहयात्री का लाइफ-बेल्ट छुड़ाकर खुद को बचा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी-चौपाल में चर्चाओं का जोर है।रामराज की प्रतीति हो रही है।लोग प्याज़,टमाटर और पेट्रोल भूलकर चाय पर चर्चा कर रहे हैं।बिजली,पानी सब हवा हो गया है,कुछ तो गड़बड़ है।अपने राज्य के मुखिया का पद छोड़कर दूसरे राज्य की और सारे देश की खबर ली जा रही है।किसी को भेंट में गुलदस्ते के बजाय पत्थर तो किसी को दूसरे दल के सताए और भगाए हुए नेता मिल रहे हैं।अपनी किताब बंद करके दूसरे से हिसाब माँगा जा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।समय कम है और जनता की मुश्किलें ज्यादा,सो चार्टर्ड प्लेन की सवारी करके जनता का भला किया जा रहा है।जनहित में किया गया खर्च सेवा के दायरे में आता है। अनुभवी सेवक इस बात पर कान ही नहीं देते,इसका मतलब उनके कान में ही खराबी है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी मौसम में मीडिया से मिलना-जुलना खतरनाक हो रहा है।सामने से जूता उछालने का नुस्खा पुराना पड़ चुका है।अब पीठ पीछे से उजले चेहरे स्याह किये जा रहे हैं।ऐसा करने वालों  को हर तरफ कालिख-पुती शक्लें ही नज़र आती हैं,सो वो भी क्या करें या इसी बहाने कुछ लोग कालिख में भी समाजवाद लाना चाह रहे हैं।सब एक जैसे दिखेंगे,तभी उनका मिशन पूरा होगा,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी टिकटें जितनी बंट रही हैं,उससे ज्यादा तो कट रही हैं।टिकट कटने से आत्माएं आहत हो  रही हैं।नैतिकता और निष्ठा को थोड़े दिनों के लिए कोने में धर दिया गया है।शरीर की रक्षा पहले ज़रूरी है।जब वही नहीं रहेगा,तो आत्मा कहाँ भटकेगी ? धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे तो उनके लिए महाभारत करनी पड़ी थी और जब किसी का एक ही चिराग हो तो वो क्या कर गुजरेगा,सोचिये ! कुछ तो गड़बड़ है।

अब सुराज की आहट हो चुकी है।सेंसेक्स होली में दीवाली मना रहा है।मंहगाई और भ्रष्टाचार एक्सपायरी डेट में चल रहे हैं।धर्म और जाति के झंडे ऊँचे और ऊँचे हो रहे हैं,कुछ तो गड़बड़ है !


15/03/2014 को 'जनसंदेश टाइम्स' में




 

शनिवार, 8 मार्च 2014

शुक्र है,वे इतिहास पढ़े हैं !

जनसन्देश टाइम्स में 07/03/2014 को 

वो पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं।उनके गुजरने के बाद पीछे जो धूल का गुबार उठता है,बचे हुए लोग उसी में लट्ठमलट्ठ करने में मशगूल हो जाते हैं।जब तक वे लोग ऐसा करते हैं,उनका काफ़िला नया इतिहास रचकर आगे बढ़ लेता है।उनमें गजब का आत्मविश्वास है और उससे ज्यादा अपने समर्थकों पर भरोसा।वे पढ़कर तो आये हैं राजनीति, पर बदल रहे हैं इतिहास।राजनीति में बात करने का किसी दूसरे को वो मौका ही नहीं देते।वे नित्य एक नया एजेंडा बनाते हैं और उनके विरोधी थाली बजाते ही रह जाते हैं ।वैसे भी इस मुई राजनीति में अब बचा ही क्या है ? भ्रष्टाचार,मँहगाई और कदाचार को वे बिलकुल पसंद नहीं करते,इसलिए इन विषयों पर समय गँवाकर वे जनता को हलकान नहीं करना चाहते।वे एक-एक कर इतिहास के पन्ने पलटते जा रहे हैं।उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावी है कि इतिहास उनके मुँह से बोलने लगता है।वे जो कहते हैं ,वही इतिहास बन जाता है।उनको पता है कि लोग राजनीति की गंदगी से ऊबे हुए हैं,सो जल्द ही इतिहास पर चर्चा शुरू कर देते हैं।लोग भी चाय की चुस्कियों के साथ उनके इतिहास-ज्ञान से अभिभूत हो उठते हैं।

फिर भी,कुछ लोग इतने अहमक हैं कि इतिहास के तथ्यों से खुद को बड़े गहरे से जोड़ लेते हैं,संवेदनशील हो उठते हैं।इतिहास अतीत का आख्यान है और अगर कोई अपना भविष्य बनाने के लिए इतिहास को बदलता है तो इसमें हर्ज़ क्या है ? आखिर जब भी कोई बदलाव होता है तो इसकी कीमत इतिहास ही तो चुकाता है।इसलिए अगर राजनीति आगे बढ़ने के लिए इतिहास के कंधे का सहारा लेती है तो ज़ाहिर है कि उसकी कुछ हड्डियाँ तो चरमराएंगी ही।महत्वपूर्ण तथ्य तो यही है कि अब तक राजनीति ने ही इतिहास को गढ़ा है और वे भी यही काम कर रहे हैं।जनतंत्र में जनमत सबसे मुख्य माना गया है और वह अधिकतर उनके साथ है,यह वे साबित कर रहे हैं । उनकी मशाल के साए में लोग अपने-अपने चिराग लेकर उदित हो रहे हैं । इसलिए उनके समर्थकों को इतिहास की नहीं राजनीति की चिंता है।इतिहास की गड़बड़ तो वे बाद में ठोंक-पीट कर ठीक कर लेंगे।

उन्होंने देश के विकास के लिए अपना प्लान तैयार कर लिया है।उनकी इस योजना में ‘सबका’ नाश तय है।यह पिछले जमाने की बात हो गई ,जब ‘विश्व में सद्भाव हो,सबका कल्याण हो’ का उद्घोष किया जाता था।अब बदले ज़माने में नारा भी बदल दिया है उन्होंने।अब उनके समर्थक ‘सबका विनाश हो’ की हुँकार भर रहे हैं।उन बेचारों को यह भी नहीं पता चल रहा है कि इस ‘सबका’ में वो भी तो शामिल हैं।वे आगे बढ़ने में कहीं पिछड़ न जाएँ ,इसलिए स्वयं को पिछड़ा बता रहे हैं।उनका दल बिलकुल पारदर्शी तरीके से काम करे,सो इसके लिए बॉलीवुड से पारदर्शिता में विशेषज्ञता हासिल कर चुकी हस्तियों को बुला रहे हैं।वे इस चुनाव में जीत-हार से परे होकर नए इतिहास की संरचना में व्यस्त हैं।इतिहास भी अपनी इस उपलब्धि पर खुद को बड़ा रोमांचित-सा महसूस कर रहा है ।

यह तो गनीमत है कि उन्होंने इतिहास पढ़ा है। अगर कहीं विज्ञान पढ़े होते तो सोचिये क्या-क्या होता ? तब बल्ब का आविष्कार न्यूटन और रेडियो का शेख चिल्ली साहब किये होते ! किसी को भला इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ पैदा हुआ या कौन सा शहर किस देश में है या फलां कौन सी जेल में रहा ? महत्वपूर्ण तो यह है कि यदि वे इतिहास पर अपने प्रयोग करने के बजाय विज्ञान पर करते तो वैज्ञानिक हाइड्रोजन और कार्बन डाई ऑक्साइड के मेल से जल कैसे बनाते या सीएनजी से वायुयान कैसे उड़ाते ? इसलिए इतिहास के इस बलिदान को विज्ञान हमेशा याद रखेगा और इसके लिए वैज्ञानिक उनके आभारी हैं ।


संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...